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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 76, जनवरी(प्रथम), 2020

हम भूल गये

डॉ॰ मोहन सिंह यादव

पूरब को हम तो भूल गये , पश्चिम में हम तो घुल गये , हम अपने को ही भूल गये | महलों में रहना सीख लिया , छ्प्पर में रहना भूल गये | हम श्रृंगार की बातें कर ली , करुणा की बातें भूल गये | आदर्श की बातें खूब चलीं , यथार्थ से मुँह को मोड़ लिया | रोटी तो खाना सीख लिया , गेहूं के दाने भूल गये | कुछ दर्द की बातें कर ली , दर्द में रहना भूल गये | जीवन तो मेरा बीत रहा , जीवन क्या है भूल गये ? कुछ यस नो करना सीख लिया , अपने आचार को भूल गये | सीसे चश्में खूब सराहा , असली आँखे भूल गये कुछ प्रेम की बातें कर ली , हम प्रेम में जीना भूल गये | पश्चिम के अंकल याद रहे , भारत के चाचा भूल गये | मम्मी – डैडी याद रहे , माँ – बाप की ममता भूल गये | अब पैंट – शर्ट में शान जमे , हम धोती – कुर्ता भूल गये | घास – पात से दूर रहे , हम मनी – प्लांट में चूर रहे , मंदिर – मस्जिद याद रहे , मन ‘ मोहन ’ मंदिर भूल गये |


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