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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 76, जनवरी(प्रथम), 2020

मन की व्यथा

डॉ॰ मोहन सिंह यादव

ये तो रात है किसी तरह कट ही जायेगी , दिन के उजालों के लिए मायूस हूँ | ये तो बात है किसी तरह बन ही जायेगी , उन वसूलों के लिए लहूलुहान हूँ | ये तो मौत है किसी दिन आ की जायेगी , जिन्दगी की सफर के लिए मोहताज हूँ | ये तो औरों की महफिलें हैं रंगीन ही होंगी , मैं अपनों की महफिलों में अजनबी हूँ | ये तो दिल की बात है, जुबां पे आ ही जायेगी ; मनमीत मैं बनावट का विरोधी हूँ | ये तो बददुआएं हैं गैरों से मिल ही जाएंगी , आप की दुआओं के लिए शुक्रगुजार हूँ


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