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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 76, जनवरी(प्रथम), 2020

मैं अनन्या

डॉ० कोयल विश्वास

नर हो, न नारी हो, असीम क्षमता के अधिकारी, तुम किन्नर हो। ईश्वरीय संरचना में अनन्य, धैर्यशाली, कर्तव्यपरायण, मानवश्रेष्ठ - तुम किन्नर हो। पौरुष में सुडौल, शक्ति तुम में अपार, बुद्धिबल एवं विवेक में अतुलनीय निरंतर। नारीत्व की गरिमा, सौन्दर्य की उपमा, ममता, स्नेहानुभूति एवं दया तुममें अपारावार। समाज के कठोर शब्दबाण से सदा व्यथित हुए सभी लैंगिक मतभेद में तुम निरुत्तर रहे। पुरुष जाति से विलग, चाहो तो नारी जाति में सम्मिलित हो जाओ, नारी तुमसे गौरान्वित हो, तुम अपने अस्तित्व पर अभिमान करो। केवल समानता के अधिकार से नहीं, मनुष्यत्व के मापदण्ड पर तुम सभी को सीना तानकर जीना सिखाओ। अश्रुपात से नहीं, अभिव्यक्ति में आत्मसंतुष्टि हो सदियों से व्यथा सहनेवाली किन्नर, अब तो तुम जागो। जब जब सत्ता छीन ली गई तुमसे, दूसरी नीड़ तलाशी तुमने, अपनी अस्मिता को दुनिया के सम्मुख लाने का क्यों कभी ज़िद नहीं किया तुमने? कभी शिखंडी के रूप में तुम किसी की ढाल बनी तो कभी सम्राटों के अंतःपुर की सेविका, हर स्थान में केवल उपयोग की वस्तु बनकर मौन तुमने कैसे काटी सदियाँ? आज तुम धीरे-धीरे उन्नति की राह पर चल रही हो, शिक्षा एवं उद्योग क्षेत्र में प्रशंसा के पात्र भी बनी हो। वह दिन दूर नहीं जब तुम स्वयं अपनी पहचान बनोगी, केवल तुम अपनी अस्मिता स्थापित करोगी न नर, न नारी केवल किन्नर शिरोमणि बनकर दुनिया को दिखाओगी। फिर यही समाज नतमस्तक होकर देगा सम्मान तुम गर्व से तब कहना, ‘मै अनन्या, यही है मेरी पहचान’


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