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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 76, जनवरी(प्रथम), 2020

मेरे हमसफर

कल्श कुमार

क्यों थे मेरे हमसफर ..? अगर छोड़ना ही था मझधार में क्यों हवा के झोंके की तरह,आए और चले गए कुछ अनकही यादें देकर अब जिंदगी है एक सुनसान सफर क्यों थे मेरे हमसफर ....? जख्म देकर छोड़ना था तो क्यों अपना बनाया...? जिंदगी को एक बोझ बनाकर जीवित आत्मा को,जिंदा चिता बनाकर चले गए आशाएं सब टूटी,केवल ज़िम्मेदारियों का अंबार देकर कहीं दूर सफर पर निकल गए क्यों थे मेरे हमसफर....? सावन के झूले,मेहंदी के रंग तीज,त्योहार सब छूटे हर खुशी में एक अनदेखा दर्द अतीत की दिल झझकोर कर रखनेवाली यादें देकर चले गए क्यों थे मेरे हमसफर ....? वसंत में न बहार आई वैशाख में सब सपने बहे चारों दिशाओं में द्दाई हरियाली धरती ने श्रृंगार किया लेकिन मेरे जीवन को रंगहीन बनाकर चले गए क्यों थे मेरे हमसफर ... क्यों ???


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