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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 76, जनवरी(प्रथम), 2020

आदियोगी भोले शंकर

जया पाण्डेय 'अन्जानी'

मोह का वारण किए हैं। ध्यान मुद्रा में 'जटाधर'।। 'धीर' को धारण किए हैं। आदियोगी भोले शंकर।। साधना कोई है सनातन। चल रही है जो निरन्तर।। कंठ में है विष हलाहल। रुद्र से पर क्या भयंकर।। रूप आभा से अलंकृत। योगिनी जो हैं प्रतिष्ठित।। शस्त्र का श्रृंगार करके। वाम में शक्ति अधिष्ठित।। कुंतल सघन जैसे निशा। वेगी तिमिर हो बढ़ रहा।। शीश पर नवचन्द्र जैसे। हो 'सूर्य' पर्वत चढ़ रहा।। त्रिपुण्ड पर तटस्थ है । ललाट में जो 'अक्ष' है।। सुरम्य शान्त है मगर । यह प्रलय का कक्ष है।। ये भस्म का श्रृंगार देखो। कपाल के तुम हार देखो।। देखो अवघड़ रूप साजे। विराग का आकार देखो।। हैं सबके स्वामी शूलपाणि। 'नाथ' कहते जग चराचर।। हो दिवाकर या निशाचर। विष या गंगा सब बराबर।। शान्तचित्त मुख सौम्य है। शूल में ताण्डव बवंडर।। 'धीर' को धारण किए हैं। आदियोगी भोले शंकर।।

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