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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 76, जनवरी(प्रथम), 2020

नारी का दर्द

चंद्र मोहन किस्कू

साँसे अटक रही हैं मन अशांत है हजारों तारे बाँध कर चल रही है बोरसे की आग की तरह आँसू नहीं गिरा पा रही मुँह उसका ढँका है . बाहर निकलने से ही डर मान- इज्जत जाने का डर सबसे ज्यादा डर तो उसे घर में ही मिला है उसके सोलह साल होने से पहले ही लोगों की आलोचना का डर समाज के नियम - नीति को देखकर डर जिसे एक दल लोभी पुरुषों ने बनाया है डर और डर जन्म लेने के पहले से डर डर से कमर टूट जायेगी तुम्हारी वह फिर भी कठोर सख्त खड़ी है खिली फूल के जैसी हँसती हुई. बोलते हैं मर्यादा में रहो समाज की सुनो प्यार न करो नहीं तो मरना होगा तुम्हें केवल आँखें बंदकर सहन करो याद रखो हमेशा तुम एक नारी हो . सर उठाने की चेष्टा न करो आजादी की अभिलाषा भी मन में नहीं लाओ आसमान में उड़ने का सपना तुम्हारा नहीं है याद रखो हमेशा तुम एक नारी हो . समाज की ऊँची कुर्सी पर जो बैठे हैं बनकर ठेकेदार शांति से तुम्हे नहीं रहने देंगे लाल खून पी जायेंगे कच्चा मांस नोचकर खायेंगे और अंत में कहेंगे याद रखो --- तुम एक नारी हो .


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