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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 76, जनवरी(प्रथम), 2020

चलो पेड़ लगाते हैं

चंद्र मोहन किस्कू

आसमान में काले बादल मंडरा रहे हैं पर वर्षा नहीं हो रही . आँसू बह रहे हैं गला सूख रहा है पर उदास बादल तो उतर ही नहीं रहे हैं . हवा गर्म हो रही है मिट्टी फट रही है और धरती माँ की तो जान ही निकल रही है . आसमान में काले बादल मंडरा रहे हैं पर वर्षा बिलकुल भी नहीं हो रही है . पपीहे बोलें मोर नाचें कोयल गाये मीठी स्वर में --- और मछलियाँ पानी के बिना मर रही हैं . मौसम भी भटका है पृथ्वी गर्म हो गई है पंक्षियाँ पानी के लिए तरस रहे हैं और धरती की गोद के जीव- जन्तु ताक रहे हैं आसमान की ओर वर्षा की आशा से ----. आसमान में काले बादल मंडरा रहे हैं पर वर्षा बिलकुल नहीं हो रही है . जंगल- पहाड़ उजड़ कर शहर- नगर बसा रहे हैं कल- कारखाने बन रहे हैं पेड़- लताओं पर दुश्मनों की बुरी नजर लगी है . हरे पेड़ न होने के कारण जंगल- पहाड़ न होने के कारण आसमान के बादल भी उदास हैं धरती माँ की गोद में नहीं उतर रहे . आसमान में काले बादल मंडरा रहे हैं पर वर्षा नहीं उतर रही . चलो पेड़ लगाते हैं जंगल- पहाड़ को बचाते हैं पूरी धरती को हरियाली बनाते हैं तभी तो काले बादल धरती में उतरेंगे और हमारी जान बचायेंगे.


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