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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 76, जनवरी(प्रथम), 2020

याद, बचपन की

चंद्रमोहन किस्कु

कितना सुन्दर था वह दिन न इतिहास की चिंता थी न भविष्य की केवल खेल - कूद कर ही दिन बीत जाता था . न गिरने की चिंता थी न छिलने की मैं केवल आंधी के साथ दौड़ते रहता था . न समाज का ज्ञान था न परिवार की चिंता केवल दौड़ते रहता था उड़ती बादल के साथ . कितना सुन्दर था वह दिन नहीं था पैरों में जात- पात का बंधन न मन में था अमीर- गरीब का फर्क . न इतिहास की चिंता थी न भविष्य की .


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