मुखपृष्ठ
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 76, जनवरी(प्रथम), 2020

जंगली कौन ?

अनिल कुमार

एक शाम बहुत सोच विचाकर एक गाँव से एक लड़का पहुँच गया शहर के आँगन में कुछ आजीविका कमाने सोच रहा था वह कुछ कर दिखलाऊँगा शहर में आकर शहर से कुछ पैसे ज्यादा लेकर जाऊँगा पर पहुँचा जब शहर की हवा में तो रंग उड़ गये सब गाँव के उसके गाँव का वह भोलापन भूल गया खुद को शहर के दाव में देखा उसने इस जंगल को और देखा उसने इसमें रहनेवालों के अलगाव को महसूस हुआ उसको शहर की रोशनी के उजालों में रोशन है हर घर की दीवारें पर अन्दर जब देखा तो पता चला बाहर से दिखते जो उजाले है अन्दर से लोगों के मन उतने ही काले है पैसा तो बहुत है इसमें और लाखों कमानेवाले है लेकिन सुकून का क्या ? लोगों के मुँह में अटके निवाले है धोके से जैबें भरी हुई चेहरे से लगते रईस खानदान वाले है चोरों की मत पूछो डाकूओं का लम्बा-चौड़ा बाजार है शहर में रहनेवाले व्यापारियों का कुछ ऐसा व्यापार है मिलावट तो कुछ इस तरह खून में मिलकर लाल है शुद्धता की तो बात ही छोड़ों यहाँ दाल में काला नहीं पूरी की पूरी काली दाल है अब गाँव से आया वह लड़का शहर में क्या कमाता ? रिश्तों को खो देता या भेड़ियों सा बन शहर के इस जंगल में शहरी होने का स्वाँग दिखाता पर गाँव की सादगी उसे बचा गई शहर की सच्चाई अब उसे समझ आ गई उल्टे पैर दौड़ पड़ा गाँव की उस पगड़ंड़ी पर शहर के इस जंगल से जिस रस्ते छोड़ के वह आया था गाँव का भोलापन कुछ सुकून गवाँरपन का और कुछ रिश्तों की जागीर।


कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें