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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 76, जनवरी(प्रथम), 2020

खूनी मजहब

अनिल कुमार

लहू जो बहा तेरे तन से कुछ दर्द तो उठा था मेरे मन से कुछ आह तो तू ने भी भरी थी तू और मैं नहीं मरा था पर मानवता दोनों की मरी थी पर हकीकत कुछ ऐसे है मजहब दोनों के कहते हैं तू भी कतरा है इंसानी मैं भी हिस्सा हूँ इंसानी फिर क्यों नफरत की आँधी तेरे-मेरे बीच में उठती है तूफानी तू भी चल पड़ता है लेकर अपनी हिस्से की अग्नि मैं भी अपने हिस्से का बारूद लिये फिरता हूँ जो तू गाली दे मजहब की मैं तलवार उठा लेता है सड़कों पर कुछ लाल लहू तेरा भी बिखरा है कुछ छींटे मेरे तन से भी बह कर फैले हैं राहों में मजहब तो तेरा भी कहता है मजहब कुछ मेरा भी सुनाता है हम लड़ते हैं जिस जंग को वह ना तेरा मजहब चाहता है ना मेरा मजहब करवाता है हम तो अपने-अपने हिस्से की लघुता को छिपाते हैं धर्म नहीं, हम खुद को रसना का अधिकारी साबित करना चाहते हैं पर कतरा जो गिरा था तेरे तन से कुछ खून बहा था जो मेरा भी क्या अन्तर था दोनों के रंग में दर्द भी एक जैसा था दोनों का चीखा तू भी था तब चिल्लाहट मेरी भी निकली थी पर सच कहता हूँ तब ना मानवता तुझ में थी ना मानवता मुझ में दिखती थी मजहब-मजहब दोनों चिल्लाते हैं तू अपने मजहब की गाता है मैं अपने मजहब की सुनाता हूँ पर मजहब क्या होता है हमको सिखलाता है क्या ना तू समझना चाहता है ना मैं समझा पाता हूँ तू भी तलवारें लेकर आता है मैं भी तलवारें चलाता हूँ तू भी खून बहाता है मैं भी लाशों के ढेर लगाता हूँ...।


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