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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 76, जनवरी(प्रथम), 2020

छोड़ो ये बदगुमानी!

डॉ० अनिल चड्डा

तुमने तो जो ख़ता की, सरेआम की, हमने तो फिर भी लाज की, तेरे नाम की ! तुम अपनी बात कह कर, मेरी भी बात सुनते, न मुझको रोना पड़ता, न तुम भी ऐसे रोते, नहीं होती जगहँसाई, किसी बात की ! हर शख्स का है होता, अपने ही दिल का तूफाँ, कोई यूँ ही रोक लेता, कोई बाँध तोड़ देता, इस बात को समझ, है बात काम की ! जीना तो सबको जीना, और एक दिन है मरना, फिर संग अपने बोलो, क्यों अहँ लेके चलना, चलो साथ-साथ मिलके, छोड़ो ये बदगुमानी !


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