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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 76, जनवरी(प्रथम), 2020

आस बनी रहने दो

डॉ. रंजना वर्मा

पपड़ाए अधरों पर प्यास बनी रहने दो । आस बनी रहने दो ।। पासे नित फेंक रहा समय का जुआरी है रमुआ की बेटी पर अभी तक कुँआरी है सेंधुर की मन मे अभिलाष बनी रहने दो । आस बनी रहने दो ।। रोम रोम जलता है जब लहू पिघलता है कोयले की भट्ठी में रोष निज उगलता है आग सी शिराओं में श्वांस बनी रहने दो । आस बनी रहने दो ।। वक्त भी बहाने है रोज़ नये गढ़ जाता सत्य का मसीहा है सूली पर चढ़ जाता प्रीति करे हृदय में निवास बनी रहने दो । आस बनी रहने दो ।।

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