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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 76, जनवरी(प्रथम), 2020

दोहे

शुचि भवि

जीवन का ये मर्म है, करिये भवि विश्वास। बेहद घातक हैं यहाँ, सबका बनना ख़ास।। बच्चों में अवसाद का, देखो अब है दंश। वक़्त उन्हें भी दीजिये,उनसे चलता वंश।। दूरी थोड़ी सी रखें, उनसे भवि श्रीमान। दिल के बेहद पास जो, रहते हों इंसान।। आप बहुत ही हैं सरल, इसका ये नुकसान। अनायास सहना पड़े,इससे दुख अपमान।। बेटी फूलन की तरह,कभी बने न गाय। उसे पनपने दीजिये,करके ठोस उपाय।। लिखें पसीने से अगर, नेक इरादे आप। जीवन के पन्ने सभी, रहें सदा निष्पाप।। यदि है सच्चा प्रेम तो, होगा ही निष्पाप। प्रभु इच्छा में दोष क्यों, ढूँढ रहे हैं आप।। कानों की ख़ामोशियाँ,कहती हैं ये बात। ऐसी धुन को मत सुनो,जो करती आघात।। जैसे चिपके एकबार, स्टीकर सरकार। वैसे भरोसा न जुड़े, टूटे जो इकबार।। वाहवाह करते सभी, मुखपोथी पर मित्र। विरला कोई ही यहाँ, मिलता बनकर इत्र।। हँसती देखो आपपर, भरी तिजोरी आज। जीवन खाली हो रहा, ज्ञान भरो सरताज।। यहाँ समय की चाल से,चलें तेज़ 'भवि' आज। अपनी धुन का आपको, बनना यदि सरताज।। दूरी बेशक ही रही, पर था हरदम प्यार। राधा मोहन से मिले, दिन में सौ सौ बार।। दिल की बातें कब यहाँ,कहती कभी ज़ुबान। भीतर भीतर मन पढ़े, प्रेमी हर इंसान।। इंतज़ार उसका करो,यूँ मत बारम्बार। तार-तार जो कर गया, रिश्तों का आधार।। अंतस में धारण करें, आप ईश का नाम। केवल मुख से मत जपें ओम-कृष्ण श्रीराम।। बच्चों बनना नेक भी, औ' ज्ञानी भी आज। सबसे पहले है मगर,माँ बहनों की लाज।। कितना मुश्किल है यहाँ, परिवर्तन श्रीमान। लाख हथौड़े जब पड़ें, तब सिल पड़े निशान।। बाहर सागर की कभी, हो कितनी भी धार। डूबे कश्ती भीतरी, जल से ही हर बार।। अपनेपन का मत करें, भवि उससे इज़हार। जिसने हरदम आपका, ठुकराया हो प्यार।। परिचय की मुहताज है, रूह नहीं श्रीमान। ये शरीर ही माँगता,है आदर- सम्मान।। बची नहीं संवेदना, जड़वत सब इंसान। रोते होंगे देखकर, अपनी कृति भगवान।। घाव भरे कब वक़्त ने, साचें ये भी आप। दूजे को जो आप दें, दर्द, बड़ा है पाप।। अर्जित जिसको हम करें,असली वो सम्मान। जोड़-तोड़ से मोल ले, बनता कौन महान।। कलियुग में संसार की,हुई तुच्छता शान। निम्न कोटि के हर तरफ़,मिलते आज बयान।। परिभाषा हरसू मिले,हमको आज नवीन। प्रभु प्रदत जो भाव हैं, स्वार्थ रहा है छीन।। कर्म करें ऐसे सदा, जिनसे ख़ुश हों नाथ। लिप्त आपके हों नहीं बुरे कर्म में हाथ।। नागफ़नी से बढ़ रहे,जुर्मों के अंबार। फ़ैशन की संज्ञा लिए, होता है व्यभिचार।। अगर मित्रता आपकी,जैसे पानी-मीन। तो ख़ुशक़िस्मत आप हैं, कभी न होंगे दीन।। लिखते हैं बेशक वही, मेरी हर दिनरात। पर अब कहने को रहे, काग़ज़ क़लम दवात।। छोटी बातों को अगर, दिल पर लेते आप। भला बड़े संबंध की,होगी कैसे नाप।।

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