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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 76, जनवरी(प्रथम), 2020

सम्बन्धों की धार

डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

सम्बन्धों को जी नहीं, पाते हैं जो लोग। अपनेपन का वो यहाँ, झेलें सदा वियोग।। -- सम्बन्धों की नाव की, नाजुक है पतवार। इसे प्यार से थामकर, करना सागर पार।। -- सम्बन्धों की डोर को, अधिक न देना ढील। मत देना परिवार में, झूठी कभी दलील।। -- कर्म असीमित है यहाँ, सीमित हैं अधिकार। बहने देना प्यार से, सम्बन्धों की धार।। -- मतलब पड़ने पर जहाँ, होते हैं अनुबन्ध। अधिक देर टिकते नहीं, वहाँ कभी सम्बन्ध।। -- सम्बन्धों के नाम पर, मत करना अनुबन्ध। केवल दुआ-सलाम तक, रहने दो सम्बन्ध।। -- गायब होते जा रहे, अब असली सम्बन्ध। मतलब के संसार में, आती है दुर्गन्ध।। -- जहाँ दूर तक भी नहीं, उगते हैं सम्बन्ध। सम्बन्धों पर हैं वहाँ, झूठे शोध-प्रबन्ध।।

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