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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 76, जनवरी(प्रथम), 2020

पुत्री की बिदाई

कवि: अनिल चावडा
अनुवादक: डॉ. रजनीकान्त एस.शाह

इत इतने बरस जिसने घर को रखा उष्मित मेंहदी रचाकर चला आज घर का वह उजास बिटिया के जाने से ऐसा लगता गया गवाक्ष से दीया नहीं जुड़ेगा अब यह मुहल्ला चाहे सिओ जितना पड़ते ही उसके पदचिह्न सर्वत्र हो जाता रजवाड़ा। मेंहदी रचाकर चला आज घर का वह उजास रंगोली में पड़ेगी नहीं रे पहले जैसी बेलबूटेदार छाप दूर दूर रे चली जाएगी घर की यह मिरात अश्रुभीनी होगा सबकी अँखियों का झरुखा मेंहदी रचाकर चला आज घर का वह उजास।


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