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वर्ष: 3, अंक 55, फरवरी(द्वितीय) , 2019



निःस्वार्थ


सलिल सरोज


 
बंजर में फूल खिल गया है कोई
अपना दिल हार के गया है कोई

उदास सा लगता है खुदा कोई
बच्चा मन मार के गया है कोई

माँ अधमरी हो गई दफ़अतन
कलेजा फाड़ के गया है कोई

तुम्हारी छतों पे सूरज दिखे है
अपनी धूपें लार के गया कोई

रातें हमेशा यूँ उजियारी न थी
अँधेरा अभी बुहार के गया कोई

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