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वर्ष: 3, अंक 55, फरवरी(द्वितीय) , 2019



हद


डॉ० अनिल चड्डा


 
मेरी हद तो तुझी तक है
तू अपनी हद तो बता
बात बस इतनी सी है
किसी की तो है खता

तुम तो उलझे रहे
बस अपने ही ख्यालों में
ये भी सोचा नहीं
कोई कर सकता है गिला

जो भागते नहीं कभी
अपनी जिम्मेदारियों से
मुँह  फेरता नहीं
तुझसे कभी भी समां

चलते-चलते कभी
राह भी भटक जाते हैं
जो लड़खड़ायें पांव नहीं
खुद ही मिलता जहाँ
 

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