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वर्ष: 3, अंक 55, फरवरी(द्वितीय) , 2019



जीभ ही कट गयी


आलोक कौशिक


 
शेरनी भी पीछे हट गयी
बछड़े की मां जब डट गयी

हमारी कलम वो खरीद न सके
लेकिन स्याही उनसे पट गयी

हमारे मुंह खोलने से पहले
दांतों से जीभ ही कट गयी

सच बोलने लगा है अब वो
समझो उमर उसकी घट गयी

गौर से देखो मेरे माथे को
बदनसीबी कैसे सट गयी

कमीज तो सिला ली हमने
लेकिन अब पतलून फट गयी

उसने गले से लगाया ही था
कमबख़्त नींद ही उचट गयी
	 

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