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वर्ष: 3, अंक 55, फरवरी(द्वितीय) , 2019



बहुत हुई आवारगी


आलोक कौशिक


 
बहुत हुई आवारगी अब तो संभल जाने दो  
निभाना है मुझे राष्ट्रधर्म मत रोको जाने दो  

अंधेरा बहुत गहरा है एक चिराग़ जलाने दो  
खोल दो पिंजरें सारे परिंदों को उड़ जाने दो  

वे कोई ग़ैर नहीं हैं औलादें हैं मेरी मां की 
मत रोको उन्हें मेरे गले से लग जाने दो 

सुना है बहुत शिकायतें हैं उन्हें मेरी ग़ज़ल से 
करेंगे वो भी तारीफ़ मेरी एक बार मर जाने दो 

कहतीं हैं बहुत शराफ़त है तेरे इश्क़ में 'कौशिक' 
लगायेंगी इल्ज़ाम खुद ही मशहूर तो हो जाने दो 

	 

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