Sahityasudha view
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
मुखपृष्ठ


साहित्यकारों की रचना स्थली

वर्ष: 3, अंक 55, फरवरी(द्वितीय) , 2019



बंधुआ मजदूरी एवं संविदा व्यवस्था :
एक तुलनात्मक अध्ययन


डॉ. सुबोध कुमार शांडिल्य


बंधुआ मजदूरी खेती-किसानी से संबंधित वैसे मजदूरी का नाम था जिसमें मजदूर को मालिक के काम के गारंटी के लिए एक निश्चित धन और जमीन प्रदान की जाती थी। इसमें मजदूरी का भुगतान नगदी में नहीं कर, अनाज के रूप की जाती थी। इस व्यवस्था में मजदूर अपने मालिक के मन के खिलाफ़ दूसरे व्यक्ति के यहाँ मजदूरी नहीं कर सकता था। इसके साथ ही एक निश्चित मजदूरी पर काम करने के लिए बाध्य होता था। वह बाजार दर से मजदूरी की माँग अपने मालिक से नहीं कर सकता था। यदि वह बंधुआ मजदूर से मुक्त होना चाहता था तो उसे इसके एवज में ली गयी धन, जमीन और सभी प्रकार की देनदारियों को चुकता करना पड़ता था। यदि बंधुआ मजदूर ऐसा करने में असमर्थ होता था तो वह बंधुआ मजदूरी से मुक्त नहीं हो पाता था। इसके साथ ही यदि वह सभी प्रकार की देनदारियों को चुकता किये वगैर ही मृत्यु को प्राप्त हो गया तो उसके संतान को भी बंधुआ मजदूर के रूप में कार्य करना पड़ता था तथा यह सिलसिला तबतक जारी रहता था, जबतक मालिक से ली गयी सभी प्रकार की देनदारी को चुकता नहीं कर दिया जाता। लेकिन भारत सरकार ने बंधुआ मजदूरी प्रणाली (उन्मूलन) अधि० 1976 को लागू करके 25 अक्टू० 1975 के प्रभाव से सभी बंधुआ मजदूर को मुक्त कर दिया तथा इसके साथ ही सभी प्रकार की देनदारियों से भी मुक्त कर दिया। लेकिन बाद के काल में भी अपने बदले स्वरूप में बंधुआ मजदूरी का अस्तित्त्व रहा है।

संविदा व्यवस्था एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें किसी कर्मी या मजदूर को एक कानूनी करार के तहत कार्य करना पड़ता है। इसे कॉन्ट्रैक्ट व्यवस्था, ठेका व्यवस्था, अनुबंध व्यवस्था आदि नामों से भी जाना जाता है। वैसे तो कहने के लिए यह करार द्विपक्षीय होता है अर्थात् नियोक्ता और कर्मी के बीच आपसी समझौते व सहमति से किया जाता है, लेकिन वास्तव यह एकपक्षीय होता है यानी नियोक्ता के पक्ष में होता है। यह नियोक्ता सरकार, सरकारी कोई महकमा या कोई निजी संस्थान भी हो सकता है। लेकिन विडम्बना की बात है कि असल में किसान या आम आदमी ऐसा नियोक्ता नहीं हो सकता है। संविदा व्यवस्था एक ऐसी व्यवस्था बन गया है कि आज सरकार द्वारा तय मजदूरी से भी कम मजदूरी पर बेरोजगारों से काम लिया जाता है। सरकार स्वयं न्यूनतम मजदूरी से भी कम मजदूरी देकर मजबूर युवाओं से आज काम करबा रही है। इस व्यवस्था में यदि कोई कर्मी अथवा मजदूर अपनी हक़ की आवाज उठाता है तो उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है और उसके स्थान पर दूसरे को नियोजित कर दिया जाता है और यह सिलसिला यो ही चलते रहता है। कहने का मतलब है कि आज संविदा का मतलब शोषण हो गया है। सरकार, कंपनी या संस्थान संविदा व्यवस्था के अंतर्गत आउट्सोर्सिंग से भी अपनी जरूरते पुरी करते हैं। इस व्यवस्था के तहत सेवा प्रदान करनेवाली संस्थाओं से करार किया जाता है। सेवा प्रदान करनेवाली संस्था अपने स्तर से कर्मी अथवा मजदूर की व्यवस्था करते हैं। सेवा के एवज में सेवा प्रदान करनेवाली संस्थाओं को पैसे भुगतान किया जाता है। फिर यह संस्थान अपने कर्मी अथवा मजदूर को मजदूरी का भुगतान करता है। लेकिन इसमें सबसे खास बात यह होता है कि संस्थान अपने कर्मियों का मजदूरी भुगतान मनमाने ढंग से श्रम अधिनियम को ठेंगा दिखाकर करते हैं, लेकिन इस ओर देखनेवाला कोई नहीं है।

बंधुआ मजदूरी तथा अनुबंध प्रणाली दोनों ही शोषणकारी व्यवस्था का अभिन्न अंग है। बंधुआ मजदूरी का तो अब अन्त किया जा चुका है, लेकिन अब उसका स्थान अनुबंध प्रणाली ने ले लिया है। जहाँ बंधुआ मजदूरी जमींदारी व्यवस्था से उत्पन्न एक कृषि व्यवस्था थी, वही संविदा व्यवस्था पूँजीवादी सोच से उत्पन्न एक नियोजन व्यवस्था है। बंधुआ मजदूरी व्यवस्था में शादी-विवाह, मरनी-जिनी, दुःख-बीमारी आदि में भी मालिक का एक फ़र्ज होता था। वह उक्त अवस्थाओं में अपने बंधुआ मजदूर का मदद किया करता था। बंधुआ मजदूर भी स्वयं को मालिक का एक परिवार समझता था। वह हमेशा सुख-दुःख में अपने मालिक के साथ खड़ा रहता था। हाँ, नगदी के अभाव में मालिक भी अपने बंधुआ मजदूर का मदद नगदी में न कर गल्ला के रूप में ज्यादा किया करता था। तब मालिक के पास भी नगदी का सर्वथा अभाव होता था। खेत में उपजा अनाज ही किसान का मूल पूँजी हुआ करता था। उसी अन्न से उसे अपने परिवार का भी भरण-पोषण करना होता था और अन्य कार्य भी। आय के अन्य कोई साधन भी न थे। लेकिन अनुबंध अथवा संविदा व्यवस्था में ऐसी कोई भी मानवीय संवेदना नहीं दिखती है। वास्तव में यह व्यवस्था संवेदनहीनता के धरातल पर ‘यूज और थ्रो’ के सिद्धांत पर आधारित है। इस व्यवस्था में प्रायः संविदा के शर्तों में उल्लेखित लाभों से भी कर्मी अथवा मजदूर को वंचित रखा जाता है। लोकतंत्र के रक्षक कोर्ट ने यहाँ तक कहा है कि संविदाकर्मी को भी नियमित कर्मी के समान वेतन दिया जाना चाहिए। लेकिन सरकार के कान पर जू तक न रेंगी। सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी रह जाती है मानों वह कुछ सुना ही न हो। सरकारी क्षेत्र में ही नजर डाले तो जितने भी संविदाकर्मी हैं, सभी शोषण के शिकार हो रहे हैं। ऐसा नहीं है कि वे समय-समय पर अपनी नाराजगी हड़ताल, काम का बहिष्कार आदि के माध्यम से जाहिर नहीं करते। लेकिन सरकार दमनात्मक कार्रवाई कर उन्हें शांत कर देती है। क्या यही लोककल्याणकारी राज्य की पहचान है? क्या यह बंधुआ मजदूरी से भी बद्तर स्थिति का परिचायक नहीं है?

संविदा पर कार्य करनेवाले निजी क्षेत्र के कर्मियों का हालत भी कम बद्तर नहीं है। यहाँ मजदूरी के रूप में उन्हें कुछ दिया जाता है और वेतन पंजी पर कुछ दिखाया जाता है। जैसे हाथी का दांत खाने के कुछ और, दिखाने के कुछ और होते हैं; उसी तरह वेतन पंजी भी दो होते है। यदि कर्मी का वेतन भुगतान बैंक के माध्यम से होता है तो वहाँ भी एक नायाब रास्ते की खोज कर ली गयी है। वह नायाब रास्ता यह है कि नियोक्ता कर्मी से चेकबुक पर हस्ताक्षर करबाकर रख लेते हैं और वेतन के रूप में खाते में भेजी गयी राशि में से एक निश्चित राशि निकालते जाते हैं। हुई न यह नायाब व अनूठा तरीका! भला अब आप ही कल्पना करिए क्या बंधुआ मजदूरी व्यवस्था में कोई किसान ऐसे नायाब तरीके का इस्तेमाल करता होगा? निजी क्षेत्र में कम मजदूरी पर काम करबाना तो एक आम-सी बात हो गयी है। हक़ मांगने पर काम से निकाल देना भी एक सामान्य-सी बात हो गयी है। हम यहाँ स्पष्ट कर देना चाहते है कि निजी क्षेत्र का मतलब है निजी संस्थागत उपक्रम। निजी क्षेत्र बेरोजगारी का भरपूर लाभ उठा रहे हैं और श्रम कानून को ठेंगा दिखा रहे हैं। बेरोजगारी के इस दौर में ‘तीन बुलाबे, तेरह आबे’ वाली कहावत पूर्णतः चरितार्थ हो रही है।

बंधुआ मजदूरी और संविदा व्यवस्था दोनों शोषण पर अवलंबित व्यवस्था है, लेकिन दोनों में मूलभूत अंतर यह है कि एक में जहाँ अनपढ़, अशिक्षित, अजगारुक लोगों का शोषण होता था, वही दूसरे में पढ़े-लिखे, शिक्षित और जागरुक लोगों का शोषण हो रहा है। यो कहें कि दूसरे में शोषण कई मायनों में ज्यादा है। बंधुआ मजदूर को कुछ जमीन, कुछ गल्ला व नगदी काम करने के एवज में अग्रिम दी जाती थी। लेकिन संविदा व्यवस्था में ऐसा कुछ भी नहीं दिया जाता है, उलटे कभी-कभी संविदाकर्मी से ही लिया जाता है। सरकारी क्षेत्रों में प्रायः देखने को मिलता है कि संविदाकर्मी के संविदा को रिन्यूअल करने के एवज में पैसे की उगाही की जाती है। इतना ही नहीं उनका शारीरिक, मानसिक और आर्थिक शोषण भी किया जाता है। लेकिन विडंवना की बात है कि संविदा पर कार्यरत अधिकारी कर्मी के मुकावले ज्यादा सुविधाभोगी होते हैं। यो कह सकते है कि अधिकारी के हाथों कर्मी को लुटे जाने की पूर्ण अवकाश प्रदान की जाती है। वे संविदाकर्मी पर अनावश्यक दवाब डालकर कार्य करवाने में पूर्ण सफल हो जाते हैं और उच्च अधिकारी से अपनी प्रशंसा सुनते नहीं अघाते हैं। इसी को अपनी सफलता का आधार बनाकर अपनी सुविधाएँ बढ़बाने में भी सफल हो जाते हैं और कर्मी शोषित होने के लिए मजबूर बना रहता है।

समग्रतः विवेचनोपरांत कहा जा सकता है कि संविदा व्यवस्था, बंधुआ मजदूरी व्यवस्था का ही आधुनिक वर्जन है जो ज्यादा मारक और घातक है। इसमें शोषण-दमन की अपार संभावनाएं छुपी हुई है। यह बंधुआ मजदूरी व्यवस्था से भी जयादा शोषणकारी और भयावह है। बंधुआ मजदूरी व्यवस्था में शोषण की प्रवृति के बावजूद भी मानवीय संवेदना समाहित रहती थी। इसका प्रमुख कारण किसान को नियोक्ता के रूप में कार्य करना था। लेकिन संविदा व्यवस्था में कोई भी मानवीय संवेदना का समावेश नहीं है। इसका प्रमुख कारण पूँजीवादी सोच से संविदा व्यवस्था का उद्भूत होना है, जिसका मूलाधार ही शोषण कर लाभ कमाना है। इस शोषण और लाभ के खेल में सरकारी और निजी दोनों क्षेत्र सम्मिलित हैं। अस्तु कहा जा सकता है कि यद्दपि दोनों व्यवस्थाएँ शोषणकारी हैं, फिर भी बंधुआ मजदूरी व्यवस्था से संविदा व्यवस्था ज्यादा शोषणकारी और अमानवीय है; चाहे उसका सैद्धांतिक पक्ष कितना भी अच्छा क्यों न हो, व्यावहारिक पक्ष आम लोगों के लिए अहितकर है।


कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें