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वर्ष: 3, अंक 55, फरवरी(द्वितीय) , 2019



रिश्ता


डॉ. प्रेमलता चसवाल 'प्रेमपुष्प'


काल बैल बजा तो दी पर एक अजीब-सी घबराहट से उसके पसीने छूटने लगे।

"नीलम,जी... ?" डरते-डरते से पूछा उसने।

"जी! आप?" एक अधेड़ अजनबी को खड़ा देख ऋचा ने पूछा।

"मैं... मैं बल्लभगढ़ से हूँ। नीलम दीदी, .. यहीं... " उसे ऐसे घबराहट में बात करते देख ऋचा ने दो क़दम पीछे होकर आवाज़ दी, "एक मिनट आना, कोई मिलने आए हैं।"

उसे भी सँभलकर बात करने के लिए सही शब्द ढूंढने का मौका मिल गया। पसीने छूट रहे थे; कैसे बात करे। रुमाल निकालने को जेब में हाथ डाला कि काग़ज़ के उस टुकड़े पर हाथ लगा जिसके कारण वह यहाँ आया था। अश्वनी ने भी आकर पूछा, "जी !"

"राजीव.. नीलम जी। .. यहीं!"

"जी हाँ! पर माँ तो अब.... "

"जानता हूँ। ...!" जेब से अख़बार का मुड़ा-तुड़ा काग़ज़ सीधा कर उसकी तरफ़ बढ़ा दिया जिसे देख अश्वनी ने उसे अन्दर बुला सोफ़े पर बिठाया और पूछा, "पर माँ के देहांत को डेढ़ महीना हो गया। मैंने आप को पहले कभी देखा नहीं।"

"हाँ! आप ठीक कहते हैं, पिछले साल रेल-यात्रा में मथुरा-वृन्दावन जाते हुए उनसे मुलाक़ात हुई थी और कल रद्दीवाले को अख़बारें देते हुए इत्तिफ़ाक़ से इस पन्ने पर नज़र गई तो मैं स्तब्ध रह गया। बहन नीलम की यह फ़ोटो शोक समाचार में देखकर रहा नहीं गया तो यहाँ चला आया।"

".... " अश्वनी की शंकाभरी चुप्पी देख उसने कहा।

"मैं कोई आपका रिश्तेदार नहीं हूँ तभी आपसे नहीं मिला कभी, ट्रेन के सफ़र में उनसे मिला था..... " सहसा उसकी पनीली आँखें जैसे कोई चलचित्र देख रही हों; सम्मोहित से स्वर में बोलता गया - "दीदीजी की सहज शिकायतभरी मीठी डांट का असर समझो कि मैं अपने को आने से रोक नहीं पाया। जब वे मथुरा-वृन्दावन यात्रा पर गई थी, तब मैं और मेरा एक मित्र भी बांकेबिहारी के दर्शन को जा रहे थे। ऊपर की बर्थ पर बैठे हम अपनी मस्ती में मूँगफली खा रहे थे कि उसके छिलके उन पर गिरे कुछ ही देर में वे अपनी सीट से उठी और बोली, "भाई लोगो ये तो ठीक नहीं। ख़ाली छिलके ही फैंकते रहोगे कि कोई मुँहफली भी फैंकोगे।" बस फिर क्या था, 'ओ दीदी। सॉरी।' कह कर हमने पूरा लिफ़ाफ़ा उनकी तरफ़ नीचे कर दिया।" और लिफ़ाफ़ा पकड़ बोली वे, "भाई मुँह-फली है, इसे ऊपर नीचे क्या करें, तुम ही नीचे आ जाओ, मिलकर खाते हैं।" फिर क्या था, पूरा सफ़र और वह यात्रा हमारे मन पर अमिट यादगार बन गई।" कह कर वह रो पड़ा।

ऋचा ने अंदर जाकर पापा को अजनबी का बताया, जब तक वे उठकर आए, तो देखा, वह दोनों हाथ मुँह पर रखे रो रहा है। एक मिनट लगा उन्हें... , फिर वहीं सोफ़े पे उसके साथ धंसकर बैठ इतना ही बोल पाए, "राजकुमार भाई, तुम हो! अरे; तुम्हारी दीदी चली गई।" और दोनों फफक-फफक कर रो पड़े। साथ ही उसकी पीठ सहलाते राजीव बोले, "पर भाई, क्या वह कभी छोड़ के जा सकती है हमें..सबर रख...सबर !"


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