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वर्ष: 3, अंक 55, फरवरी(द्वितीय) , 2019



बेटी


महेन्द्र देवांगन माटी


आज मंगलू का दिमाग फिर खराब हो गया था । वह बार - बार झल्ला रहा था और बड़बड़ाते हुए कह रहा था --- मेरा तो किस्मत ही खराब है । न जाने कौन से जनम का पाप किया है जो फिर से लड़की हो गई । वह बार - बार अपनी पत्नी को डाँट रहा था ।

उसकी पत्नी रुआँसे स्वर में कहती --- ऐसे मत कहो जी, बेटी तो लक्ष्मी होती है ।

मंगलू फिर डाँट देता था --- क्या खाक लक्ष्मी है ? बेटा होता तो कुल का दीपक जलता । बुढ़ापे में हम लोगों का सहारा बनता । हमारे पड़ोसी संतराम को देखो । उसके दो - दो बेटे हैं । इसीलिए छाती तानकर चलता है । कम से कम बुढ़ापे का सहारा तो है ।

मुझे बार - बार चिढाता भी है कि तेरा कोई सहारा नहीं है ।

बेचारी सुशीला चुप हो जाती ।

समय बीतता गया । मंगलू अपनी दोनों बेटियों की शादी कर दी ।

इधर उसके पड़ोसी संतराम के भी दो - दो बहुएँ आ गई ।

बहू के आते ही संतराम के घर की स्थिति बदल गई । रात -दिन झगड़े-झंझट होने लगे ।

अंत में दोनों बहुओं ने सास - ससुर को रखने से इंकार कर दिया ।

संतराम फूट फूट कर रोने लगा और मंगलू से बोला --- मंगलू तुम्हारा किस्मत अच्छा है , जो बेटा नहीं हुआ । कम से कम तुम्हारे बेटी- दामाद तो आकर हालचाल पूछते रहते हैं । समय पर आकर सेवा करते हैं । मेरी तो किस्मत खोटी है । मैं तो बेसहारा हो गया । अब इस बुढ़ापे में कहाँ जाऊँ ? क्या करुँ ?


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