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वर्ष: 3, अंक 55, फरवरी(द्वितीय) , 2019



एक साहित्यकार की मौत


शिव प्रताप पाल


कई महीनों से उसने कुछ लिखा न था| नहीं ऐसा कहना शायद ठीक नहीं होगा, क्योंकि रोज़ सुबह से शाम तक वह कुछ न कुछ पढ़ता या फिर लिखता रहता है| उसका यह प्रयास रहता है कि उसकी मेज पर लगा फाइलों का अम्बार हटता जाये या फिर घटता जाये परन्तु फाइलें हैं कि खत्म होने का नाम ही नहीं लेती| वह एक तरफ से निपटाता है तो दूसरी तरफ से नई फाइलों का ढेर बढ़ता ही जाता है| उसके बॉस को भी उसकी इमानदारी, मेहनत, लगन, निष्ठा और काबलियत पर पूरा भरोसा है, इसीलिए दूसरों की फाइलों का बोझ भी उसकी पीठ पर लाद दिया जाता है| इन सब से वह परेशान तो बिल्कुल नहीं होता है, पर हाँ थक ज़रूर जाता है| परन्तु इस थकान में भी वह समय तलाशने की कोशिश करता है और समय मिलने पर कुछ न कुछ लिखता है| जी हाँ आपने ठीक समझा वह एक साहित्यकार है और कुछ नया सृजन करना उसका शौक| उसका यह शौक पागलपन की हद तक है| यदि कई हफ़्तों तक वह कुछ लिख नहीं पाता तो अवसाद कि स्थिति में चला जाता है|

अवसाद की यह स्थिति तब तक बनी रहती है जब तक कि कुछ नया न सृजित हो जाये| वह कर्म और धर्म दोनों में अटूट विश्वास रखता है| रोज़ मेहनत और इमानदारी से दफ्तर की फाइलें निपटाना उसका कर्म है, जिससे वह अपनी आजीविका कमा कर अपने और अपने परिवार का पालन पोषण करता है| वह जानता है कि इन फाइलों में किस प्रकार गुणा गणित करके उसका कौन सा अफसर कितनी रकम डकार रहा है, और वह यह भी जानता है कि यदि वह चाहे तो किसी भी सहयोगी से कहीं ज्यादा ऊपरी कमाई कर सकता है| पर वह ठहरा सच्चा, मेहनती, ईमानदार और खरा, इसलिए उसे गरीबी मंज़ूर है पर पाप की कमाई बिल्कुल नहीं| लेखन उसका धर्म है| वह अपने इर्द-गिर्द घट रही प्रत्येक घटना को बड़ी गहराई से देखता है, परखता है, समझता है और अपनी रचना में उन्हें उठाता है| उसका उद्देश्य समाज को संवेदनशील बनाना है| जहाँ पर जो कुछ भी उल्टा-पुल्टा है उसे सीधा करने का प्रयास करना है| वह इसे अपनी सामाजिक जिम्मेदारी मानता है| वह ठोस सपने देखता व दिखाता है, समस्याओं का समाधान सुझाता है|

अब जैसा कि इधर कई महीनों से उसने कुछ लिखा न था, अतः वह अवसाद की स्थिति की ओर बढ़ रहा है| एक तो दफ्तर के काम के बोझ के तले वह बुरी तरह दबा है क्योंकि उसका एक सहयोगी सेवानिवृत्त हो चुका है और दूसरे का तबादला हो चुका है और दोनों के स्थान पर किसी अन्य ने ज्वाइन नहीं किया है| अतः उन दोनों का काम भी अब इसी के हवाले है| दूसरी ओर उसे अब अपना लेखन भी व्यर्थ लगने लगा है क्योंकि अब समाज पर उसका असर नहीं हो रहा है| हालांकि उसका लेखन तो पहले से ज्यादा सशक्त और असरदार है और दिन पर दिन निखरता जा रहा है परन्तु भ्रष्ट-तंत्र ने भी ऐसे लोगों से निपटने के लिए चाक-चौबन्द व्यवस्था कर ली है | चकाचौंध से भरपूर अपना अलग मीडिया-तंत्र विकसित कर, अपसंस्कृति को चाशनी में डुबोकर-डुबोकर कुछ इस तरह परोसना शुरू कर दिया कि वह लोगों के दिलो-दिमाग तक चढ़ गयी और वहाँ अन्दर ही अन्दर इतनी सड़न-गलन पैदा कर दी कि अब स्थिति यह हो गयी है कि उनके शब्दकोष में शब्द तो वही हैं मगर अर्थ बदल गए हैं| जैसे अब शब्द ‘सुगंध’ और ‘दुर्गन्ध’ ने अपने अर्थों की अदला बदली कर ली है और इस प्रकार गुलाब के फूल से दुर्गन्ध आने के कारण लोगों ने उसे उगाना बंद कर दिया है और सीवर के पानी के सुगन्धित इत्र का उपयोग करना शुरू कर दिया है|

यह साहित्यकार अवसाद की गंभीर स्थिति में पहुँच गया है और ऐसा प्रतीत होता है कि शीघ्र ही वह आत्महत्या कर लेगा| उस जैसे अन्य साहित्यकारों का भी यही हाल होने वाला है| मुझे ऐसे साहित्यकारों के मरने का कोई दुःख नहीं है बल्कि इस सड़े गले तंत्र में ज़िंदा रहने को मजबूर और अभिशप्त लोगों की मजबूरी और लाचारी पर खेद है|


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