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वर्ष: 3, अंक 55, फरवरी(द्वितीय) , 2019



दो बीघा जमीन


मोहन पांडे


सार =भारतीय समाज में दहेज पहले प्राचीन काल में भी लेने की परम्परा रही लेकिन कन्या के पिता की क्षमता पर आधारित और भेंट स्वरूप थी। कालांतर में धीरे-धीरे दहेज का विकृत स्वरुप सामने आया और दहेज भारत में एक ज्वलंत समस्या रूपी कोढ बन चुका है। गरीबों की बेटियों को जलाया जाता है या वे आत्महत्या करने के लिए मजबूर होती है। लोगो के गहने व खेत तक बिक जाते हैं। इसी पर केंद्रित कहानी "दो बीघा जमीन”।

सुबरन एक ऐसा पिता है जिसकी तीन बेटियां थी। दो के तो किसी तरह हाथ पीले कर दिया और सालों तक विवाह के कर्ज को भरता रहा। फिर नंबर आया तीसरी कन्या फुलमतिया की। गौरांग हसमुख और दसवीं तक पढी लिखी लेकिन गरीबी के कारण आगे न पढ सकी। गांव रामपुर (काल्पनिक) से पास ही दीनापुर के एक खाते पीते परिवार में योग्य वर के साथ रिश्ता हुआ और वह सबकुछ अपने औकात और तय हुए बात की रस्म पूरी किया कर्ज के बोझ से लद गया लेकिन खुशी खुशी अपनी लाडली को विदा कर दिया। कुछ सालों तक तो ससुराल में सब ठीक चला लेकिन दुर्भाग्य भी शुरू हो गया। ससुराल वालों ने बार बार और दहेज की मांग शुरू कर दिया।

अभी विवाह के कर्ज को नहीं जमा किया थोड़े बहुत पत्नी के बिके गहनों को नहीं बनवा सका उधर ससुराल में बेटी को हर रोज प्रताड़ना दी जाने लगी।

पंचायत भी गांव के प्रभावशाली लोगों ने किया लेकिन बात नहीं बनी। मजबूरन सुबरन को अपने बेटी के खुशी के लिए अपने दो बीघा जमीन को बेचना पड़ा। और ससुराल वालों के चरणों में बख्शीश कर दिया। फिर भी दहेज के लोभियो को संतोष नहीं हुआ और एक दिन बहू को प्रताड़ित कर आग के हवाले कर दिया रानी बनकर गयी वेटी दहेज की ज्वाला में शहीद हो गई। उसका सबकुछ स्वाहा हो गया। पिता मजबूर हो कर अब किसी तरह जी रहा है। खेती भी गई बेटी भी गई। अब दुखमय जीवन घुट घुट के जी रहा है। हालांकि कभी कभी कुछ लोग उसके घावों पर सांत्वना के मरहम लगा देते हैं जो जीने का आधार बन जाता है।

यही विडंबना भारतीय समाज की सामाजिक व्यवस्था को तोड रही है और ऐसा जख्म दे रही है जिससे देश की मर्यादा भी लज्जित हो रही है तमाम ऐसे जगह है जहां मजबूर पिता और मा दहेज के डर से कन्या भ्रूण हत्या के लिए कलेजे पर पत्थर रखकर कर रहे हैं। हालांकि तमाम योजनाओं को महिला सशक्तिकरण के लिए शुरू किया गया है लेकिन जबतक मानसिकता नहीं बदलेगी दहेज दानव का अंत नहीं होगा।


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