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वर्ष: 2, अंक 31,  फरवरी(द्वितीय), 2018



हिंदुस्तान के विज्ञानियों का दुर्भाग्य


डॉ. एस. के. पाण्डेय


जैसे बहुत पहले हिदुस्तान में गंगा, यमुना और सरस्वती जैसी नदियों की त्रिवेणी थी । उसी तरह आज देश में ज्ञानी, विज्ञानी और अज्ञानी की तिकड़ी है । देश में न ही ज्ञानियों की कमी है, न ही विज्ञानियों की और न ही अज्ञानियों की । ज्ञानी और विज्ञानी की तो हर जगह पूछ होती है । लेकिन बेचारे अज्ञानी को कोई नहीं पूछता । क्योकि इनके पूंछ नहीं होती । विज्ञानी कहते भी हैं कि आदमी के पूंछ होती है । ज्ञानी भी मानते हैं , मनवाते हैं या कम से कम बताते हैं । लेकिन अज्ञानी यह सुनकर हँसता है । वह बिना देखे कैसे मान ले ? उसका जी ही नहीं मानता । इसलिए ही तो वह अज्ञानी है । किसी को भी अज्ञानी न ही भाते हैं और न ही लुभाते हैं । कोई इनसे बात तक भी नहीं करना चाहता । लेकिन फिर भी इनका अस्तित्व बना है । जैसे जहाँ जल होता है, वहाँ कीचड़ अपने आप हो जाता है । ठीक इसी तरह ज्ञानी , विज्ञानी के साथ ही अज्ञानियों का भी अस्तित्व सदा से रहा है ।

खैर आज के समय में हिंदुस्तान के ही नहीं सारे विश्व के विज्ञानियों के लिए एक बहुत बड़ी समस्या उत्पन्न हो गयी है । भारत के विज्ञानी तो पीछे चलने वाले हैं । इसलिए इन्हे कोई विशेष परेशानी नहीं है । जैसे पहले कभी औरतें, मर्दों के पीछे-पीछे चलती थीं । ठीक उसी तरह अपने विज्ञानी भी पीछे-पीछे चलने के ही आदी हैं । आज विश्विद्यालय व अन्य उच्च संस्थानों की स्थिति बजार जैसे हो गयी है । केवल इसलिए नहीं कि शिक्षा अब दी नहीं, बेचीं जाती है । डिग्री मिलती तो है, लेकिन खरीदना पड़ता है । हम पर्दे के पीछे की कहानी बताते हैं । पर्दे के सामने जो होता है, उसे तो हर कोई जानता ही है ।

आज विज्ञानियों की स्थिति बजार में बैठे बनियों के जैसे हो गयी है । जैसे सभी बनिये अपने-अपने सामान की विशेषता बतलाकर, चिल्ला-चिल्लाकर ग्राहकों को अपने पास बुलाते हैं । लुभाते हैं । ऐसे ही आज के विज्ञानियों को भी करना पड़ रहा है । सभी बड़े-बड़े विज्ञानियों के पास कोई न कोई थ्योरी है । बनियों की तरह ही सभी अपनी-अपनी थ्योरी को अच्छी और दूसरे की थ्योरी को ओछी बताते हैं । मामूली विज्ञानियों, विद्यार्थियों व शोधार्थियों की स्थिति बिल्कुल ग्राहकों जैसे हो गयी है । बेचारे समझ ही नहीं पा रहे हैं कि किसके पास जाएँ, किसकी थ्योरी को सही मानें, मतलब किस बनिये का सामान खरीदें । क्योंकि हर बनिया अपने सामान को ही सही मानता है और दूसरे के सामान को गलत बताता रहता है ।

हर आदमी की कोई न कोई विशेषता तो होती है । लेकिन जैसे सबकी समझ एक जैसे नहीं होती है और सीमित होती है । वैसे ही सभी विज्ञानियों की भी समझ न एक जैसे होती है और न ही असीमित होती है । ये भी तो आदमी ही हैं । दीगर है कुछ विज्ञानी अथवा ज्ञानी ऐसा नहीं मानते । कुछ भी हो विज्ञानियों के तो थोड़ी-बहुत समझ होती है ऐसा माना जा सकता है । लेकिन आज के ज्ञानी दूसरे के ही समझ से अपना काम चलाते हैं । इनमें अपना कुछ भी नहीं होता । ये सुनी-सुनाई बातों को ही प्रमाण व सिद्धांत बना लेते हैं । और अपना ज्ञान बघारते रहते हैं । जबकि विज्ञानी सिद्धांत बनाता है और प्रमाण खोजता है । मिले न मिले, सही हो या न हो यह दूसरी बात है ।

जैसे भारत के ज्ञानी महान होते हैं । ऐसे ही यहाँ एक से एक महान विज्ञानी भी हैं । विज्ञानी कई तरह के होते हैं । एक ऐसे हैं जिन्हें देश के बाहर शायद कोई-कोई जानता हो । दूसरे इस तरह के हैं जिन्हें विदेश में तो नहीं कम से कम देश में लोग जानते हैं । तीसरे कोटि के वे विज्ञानी हैं जिन्हें देश में न ही सही प्रदेश स्तर पर जाना जाता है । चौथे कोटि वाले प्रदेश में भी नहीं केवल क्षेत्रीय स्तर के विज्ञानी होते हैं । अब रहे पाँचवे स्तर के विज्ञानी जिनकी हिंदुस्तान में भरमार हैं । ये केवल अपने तक ही सीमित रहते हैं । इन्हें कोई नहीं जानता कि ये भी विज्ञानी हैं । इनकी सबसे बड़ी विशेषता यह होती है कि केवल इन्हे ही मालुम होता है कि ये भी विज्ञानी हैं ।

हिंदुस्तान में पांचवे कोटि वाले विज्ञानी विश्वविद्यालयों से लेकर जाने-माने शोध संस्थानों में भी पाए जाते हैं । यहाँ हम कॉलेजों की बात नहीं करते, क्योंकि हम किसी को रुलाना नहीं चाहते । वहाँ पढ़ने वाले और उनके माता-पिता कम नहीं रोते । उन्हें उन्हीं की स्थिति पर छोड़ दिया जाय यही बेहतर है ।

विज्ञानी को बहुत सोचना पड़ता है । सोचना तो सभी को पड़ता है, चाहे अज्ञानी हो, या ज्ञानी अथवा विज्ञानी । कोई न भी सोचना चाहे तो भी उसका दिमांग सोचता रहता है । अब चूंकि दिमांग हमेशा कुछ न कुछ सोचता रहता है । इसका मतलब है कि हम सभी हमेशा कुछ न कुछ सोचते रहते हैं । इसीसे लोग हमेशा बिजी भी रहते हैं । क्योंकि उनका दिमांग हमेशा बिजी रहता हैं । जब लोग सोचते हैं कि वे फ्री हैं । तब भी दिमांग कुछ न कुछ सोचता अथवा कोई न कोई योजना बनाता रहता है । अतः लोगों का यह सोचना कि वे फ्री हैं , वैज्ञानिक दृष्ट से बिल्कुल गलत है । क्योंकि जो स्थिति दिमांग की होती है । वही स्थिति आदमी की भी मानी जाती है । जैसे मृत या पागल ।

सोचते तो सभी हैं । लेकिन हर कोई विज्ञानी और ज्ञानी नहीं बन पाता । जैसे कमाते तो सभी हैं, लेकिन खाते-उड़ाते और जमा कम ही लोग करते हैं । अधिकांश पांचवे कोटि वाले विज्ञानी हमेशा और इतना सोचते रहते हैं कि वे सोचने के लिए भी सोचते हैं । ऐसे ही एक विज्ञानी से मैंने एक प्रश्न पूछा तो उत्तर मिला सोचना पड़ेगा । मैंने फिर पूछा क्या सोचना पड़ेगा ? उत्तर मिला यह भी सोचना पड़ेगा कि सोचना क्या है ?

हिदुस्तान के और खासकर पांचवे कोटि वाले विज्ञानी कम से कम चित्रों में ही सही देख चुके हैं और पढ़ व सुन भी चुके हैं कि विदेश के कई विज्ञानी जिन्होंने बड़े-बड़े शोध किए, दाढ़ी रखते थे । यानी कभी शेव नहीं करते थे । यही सोचके ये लोग भी शेव करना छोड़ दिए । लेकिन परिणाम कोई नहीं निकला । कहीं खबर छपी कि अमुक विज्ञानी को नोबेल प्राइज मिला । तो उनका चित्र देखकर, दर्पण में अपनी दाढ़ी और मूँछें देखते हैं कि आखिर क्या कमी है ? जरूर कुछ न कुछ घपला हुआ है । और हर बार हो जाता है ।

ऐसे ही विज्ञानियों ने सुना कि एक बिदेशी विज्ञानी बहुत ही भुलक्कड़ किस्म के थे । बाद में वे नोबल प्राइज जीत लिए । वे आते तो थे अपने विभाग में लेकिन भूल कर गर्ल्स हॉस्टल में पहुंच जाते थे । लेकिन हिदुस्तान में रोज-रोज गर्ल्स होस्टल में घुसना उतना आसान नहीं हैं । इसे कई हिंदुस्तानी विज्ञानी अपना और देश का दुर्भाग्य समझते हैं और कहते हैं कि यहाँ कुछ नहीं हो सकता ।

खैर होस्टल में नहीं जा सकते लेकिन बहुत से विज्ञानी घर से तो आते हैं कार से लेकिन वापस पैदल ही पहुंच जाते हैं । वहाँ कोई बताता है कि आप कार से गये थे । तब बोलते है कि ओह ! आई सी ! आई सी ! फिर वापस आते हैं और कार से घर पहुंचते हैं और किसी प्राइज की खबर उड़ते ही अपना नाम और फोटो तलाशते हैं । लेकिन फिर कोई न कोई भूल हो गयी या गडबडी हो गयी ऐसा मानते हैं और अपने दुर्भाग्य पर आसूँ बहाते हैं । जब किस्मत ही साथ नहीं देती तो क्या करें ? शायद कभी साथ दे ही जाए यह सोचकर आगे का शोध जारी रखते हैं । जो सही भी है क्योंकि किस्मत का क्या भरोसा ? हो सकता है देर सबेर बाजी मार ही ले जाएँ ।


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