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वर्ष: 2, अंक 31,  फरवरी(द्वितीय), 2018



वेलेंटाईन डे पर विशेष:
वेलेंटाईनडे
कितना प्यार , कितना व्यापार ?

घनश्याम बादल


युवामन , वसंत का मौसम , और ऐसे में आ जाता है 14 फरवरी यानि वेलेंटाईन डे । तब ‘क्यूपिड़’ यानि कामदेव का जादू युवा मन को डांवा डोल करेगा ही । बस इसी सूत्र को पकड़ कर व्यापारी जगत ने भी अपने पत्ते चल दिये हैं । प्यार अब दो ‘दिल के तार’ के साथ व्यापार को भी झंकृत कर रहा है , उसे भी परवान चढ़ा रहा है । जवां दिलों को शकुन मिल ही रहा होगा पर प्यार के बहाने फरवरी के छोटे दिनों में व्यापार का आकार कहीं ज्यादा तेजी से बढा़ है । यही है आज वेलेंटाईन डे का असली मतलब ।

यूं छाया वेलेंटाईन डे:

यों व संस्कारो की पोषक भारतीय संस्कृति की वर्जनाएं जब जवां दिलो के मिलन में अड़ी खड़ी थी , तब पष्चिम की उन्मुक्त संस्कृति प्रेम का पैगाम लेकर आई और छा गई 14 फरवरी यानि वेलेंटाईन डे के रूप में । आज इसके प्रति कितना क्रेज बढ़ गया है यह बताने की जरुरत नहीं है । ‘लव बउर््स’ यानि प्रेमी जोड़े अपना वेलेंटाईन ढूंढने सब वर्जनाओं व प्रतिबंधों का धता बताते , हर खतरा उठाते हुए निकल पड़ते हैं वेलेंटाईन डे पर अपना प्रेम पाने के लिए । आइए जानने की कोषिष करते हैं वेलेंटाईन डे का मतलब व उद्देश्य ।

क्हां से आया वेलेंटाईन डे ?

वेलेंटाईन डे के पीछे की लंबी कहानी का लब्बो लुबाब यह है कि जब राजा व षासन तक प्रेम के खिलाफ थे तब एक चर्च के पादरी ने लवबडर््स के लिए चोरी छुपे काम करना षुरु किया । चूंकि पादरी का छद्म नाम ही वेलेंटाईन था सो प्रेमियों ने एक दूसरे को अपना वेलेंटाईन कहना शुरु कर दिया। मगर कहते हैं कि प्यार छुपाए नहीं छिपता तो राज़ खुलना ही था और तब माहौल में प्यार की सजा भी साफ थी वेलेंटाईन को जीवन से हाथ धोना पड़ा । भले ही वेलेंटाईन नहीं रहा पर अपने पीछे वेलेंटाईन डे छोड़ गया । जो आज भी अपना जलवा बिखेर रहा है । यह प्रेम की ही ताकत है कि लोग जालिम सम्राट को तो भूल गए पर वेलेंटाईन डे के रूप में संत वेलेंटाईन आज भी जिंदा हैं ।

बहुत पुरानी प्रेम परम्परा भारत की:

प्रेम को प्रदर्शन की नहीं अपितु दर्षन व अनुभूति की भावना मानने वाले भारत में प्रेम की परम्परा नई नहीं है , हां , सांकेतिक रूप में प्रेम हमारे लिए देह से अधिक दर्षन से जुड़ा रहा है । लैला मंजनू , हीर रांझा , षीरी फरहाद , सोहनी महिवाल के साथ दुष्यंत -षकुंतला , संयोगिता - पृथ्वीराज , कृष्ण व रुक्मणि के प्रेम प्रसंग बड़े चाव से सुने जाते रहे हैं ।

देवी देवता भी करते रहे प्रेम:

इतना ही नहीं हमने तो अपने देवी देवताओं में भी रति - कामदेव , शिव - पार्वती राधा - कृष्ण , सीता - राम के जोड़े बना रीखे हें आदर्ष पेेम प्रतीक रूप में । भारत की संस्कृति में प्रेम में भक्ति व समपर्ण भरे प्रेम को अधिक सम्मान मिला है । जबकि पाष्चिम के प्यार में देह व भोग का भाव अधिक देखा गया है । जहां हमारे लि प्रेम महसूस करने व गूंगे के गुड़ की तरह आस्वादन का जोर है वही पष्चिम ने प्रेम को स्वर दिया है । लेन देन का मंच दिया है । प्रेम पत्र दिए हैं ।

पहला प्रेम संदेश:

माना जाता है कि 1400 ई0 में लकडी के महीन टुकड़ों पर बने हुए वेंलेंन्टाईन कार्ड अस्तित्व में आए । ऐसा पहला कार्ड 1415 में होने का प्रमाण मिलता है । कहा जाता है कि पहला प्रेम पत्र मिट्टी की फर्द पर लिखा गया था जो मानव की प्रेम की अभिव्यक्ति का पहला लिखित प्रमाण माना जाता है ।

हालांकि भारतीय साहित्य में ‘भ्रमरगीत’ से प्रेम को मुखरित किया गया है ।यहां प्रेम के संदेष सूरदास से पहले कालिदास ‘मेघदूतं’ में भेजते दिखते हैं और उससे भी पहले रुक्मणि कृश्ण को बुलावा भेजती है अपने अपहरण का ।

बदलती प्रेम लीलाएं:

कबूतर यहां प्रेम संदेष वाहक रहा है पर स्पीड़ के जमाने में स्लो प्रेम को कौन तवज्जो देता है । सो अब प्रेम ने भी गति पकड़ व्हाट्सए ,फेसबुक , ई0 मेल , ई0 कार्ड्स , पॉपअप कार्ड्स म्यूजिक कार्ड्स आदि के साथ एस एम एस ,एम एम एस , ई मैसेज से प्रेम को अभिव्यक्ति दी है ।

प्यार और दीवार :

अब किसका प्रेम कितना सच्चा या झूठा है इस पर बात करने का मतलब है रार खड़ी करना । आज भी प्रेम के विराधी मौजूद हैं जो प्रेमीजनों को मौत का उपहार देने तक में नहीं झिझकते । ऑनर किलिंग के चलते प्रेमी सकते में हैं , जाति , धर्म , मज़हब की दीवारंे आज भी हैं । अरेंज्ड मैरिज ही आज भी सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है पर फिर भी प्रेम जिंदा है जो वेलेंटाईन डे के बहाने आज भी सर उठाने की जुर्रत करता है ।

प्यार नहीं व्यापार :

वेलेंटाईन डे का दूसरा सच है व्यापार जगत की दूर की सोच । यह क्षेत्र अपने उत्पादों की बिक्री बढ़ाने के लिए वेलेंटाईन डे को पूरी तरह से भुनाने में जुटा है । महंगे गिफ्ट का चलन इसी नीति के चलते आज स्टेटस सिंबल बन गया है । ग्रीटिंग काड़्स का ज़माना गया तो अब उपहार का युग आ गया है । अनुमान है हर साल वेलेंटाईन डे पर दुनिया भर में करीब 1000 मिलियन डॉलर से भी ज्यादा का व्यापार होता है । गहने , कपड़े , मोबाइल , लेपटॉप , के साथ हीरे व प्लेटिनम के उत्पाद अमीर लोगों के प्रेम इज़हार का जरिया बन चुका है ।

पैसा पीता प्रेम:

आज क्लबों व होटलो में पार्टियों के बहाने प्रेम मिलन पर जोर है , हर वेलेंटाइन डे पर केवल भारत में ही होटल इंडस्ट्री एक अरब रुपए से भी ज्यादा की कमाई कर रही है । आज के दिन होटलापें में कमरा मिलने का कोई रेट नहीं रह गया है । पर जेब में दम है तो क्या ग़म है हर चीज उपलब्ध है । गिफ्ट उद्योग व फिल्म उद्योग भी इस मौके को अच्छा खासा भुना रहा है । यानि अब ‘प्रेम न हाट बिकाय’ की बात सच्ची नहीं रह गई है । प्रेम भी जाने अनजाने में व्यापार का हिस्सा हो गया है ।


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