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वर्ष: 2, अंक 31, फरवरी(द्वितीय), 2018



जय भारती


सुशील कुमार शर्मा


  

हिम तुंग शिखर से आच्छादित
भारत का स्वर्णमुकुट चमके।
माता के पावन चरणों में
हिन्द नील का जल दमके।

पश्चिम में कच्छ की विशाल भुजा
पूरब में मेघ की गागर है।
उत्तर में है कश्मीरी केसर
दक्षिण में हिन्द का सागर है।

भारत अविचल और सनातन 
सब धर्मों का सम्मान यहां।
बाइबिल गीता और कुरान की
शिक्षाओं का गुणगान यहां।

भारत माता की जय कहना
अपना सौभाग्य समझता हूं।
मातृभूमि पर शीश चढ़ाना
जीवन लक्ष्य समझता हूं।

मीरा की भक्ति का भारत 
सीता की त्याग कहानी है। 
पन्ना धाय की है ये भूमि 
बलिदानों की अमर कहानी है।

आजाद,भगत सिंह,के सीने से 
हुंकार उठी आज़ादी की। 
बिस्मिल अशफाक ने पूरी की 
कसम अंग्रेजों की बर्बादी की। 

आज़ादी को हमने पाकर
उसका मूल्य नही जाना है।
मनमानी को ही हमने अब तक
अपनी स्वतंत्रता माना है।

बलिदानों की बलिवेदी पर
हम शीश चढ़ाना क्या जानें?
भारत माता के शुभ्र भाल पर
आरक्त चढ़ाना हम क्या जाने?

भारत माता क्या होती है
तुम पूछो वीर भगतसिंह से।
त्याग अगर करना चाहो तो
सीखो शहीद नृसिंहों से।

जिस रज में मैंने जन्म लिया
तन मन उसको धारे है।
भारत माता की रक्षा में
प्राण समर्पण सारे हैं।
 

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