Sahityasudha view
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
मुखपृष्ठ


साहित्यकारों की रचना स्थली

वर्ष: 2, अंक 31, फरवरी(द्वितीय), 2018



ये कैसी आज़ादी??


शुचि 'भवि'


  

कभी कहा था न तुमने
न इंतज़ार करना मेरा अब
न आऊँगा कभी
गुज़रा वक़्त हूँ तुम्हारा
चला ही जाऊँगा दूर बहुत दूर,,

फिर
क्यों आज हवाओं में तुम्हारी
ख़ुशबू है
फूल खिलने लगे
नदियों में हलचल है
झील के पानी में 
कंकड़ फेंक दिया किसीने
क्या तुम वापस आये हो
देखने 
ज़िंदा हूँ या नहीं
न न 
यूँ न करना अब तुम
यदि आना तो अब न जाना कभी
और जो हो जाना तो
न आना अभी या कभी
तुम्हारे बिन तुम्हारे साथ जीना
सीखा था न मैंने
बेहद जतन से
अपनी तोड़ी गयी चूड़ियों को
समाज से लड़ कर 
जोड़ा था न मैंने
तुम थे न तब मेरे साथ
मेरा हौसला बन कर
आज भी तो हो
फिर
क्यों आ रहे हो??

सच
अब आ ही जाओ 
हमेशा के लिए...
 

कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें