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वर्ष: 2, अंक 31, फरवरी(द्वितीय), 2018



मैं हूँ चापाकल


शिबू टुडू


  

सुनो ! सुनो !
दुनियाँ वालों
आगे मुँह है
पीछे लम्बी पुँछ
ऊपर सिर्फ है सिर मेरा
नहीं है कोई मुँछ
क्या दिन है, क्या रात
सभी लोग रहते,मेरे साथ।
कोई पुँछ ऊपर ,तो कोई नीचे करते
दर्द इतनी होती, मुझे आँसू बहाने पड़ते
आँसू मेरे लपक - लपक कर
लोग खूब  मजा लुटते
भीतर - भीतर मैं गुस्से का बम फुटते।
क्या मोदी सरकार
क्या रघुवर
क्या काँग्रेस,क्या झामुमो
सभी ने तो मुझे छेडा़ है
बाकी ग्रामीणों ने क्या कुछ छोड़ा है?
याद आती है मुझे
उस गर्मियों की
जिस दिन मेरे ओठ फटे थे
पँुछ की हिलना बंद थी
आँख की आँसू बंद थे
लोग मेरे पास आते जरूर थे
मगर एक नहीं दो - दो लात मारके निकल पड़ते।
मुझे याद है
उन दिनों की भी
जब सरकारी 
गैर  सरकारी
मिस्त्रियों ने मुझे
चल बसे,समझकर
कहीं और  अन्यत्र उठा ले जाते
और बेवकूफों का फायदा उठाकर
अपने जेब खूब गरमाते।





 

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