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वर्ष: 2, अंक 31, फरवरी(द्वितीय), 2018



हादसे यहाँ नहीं होते


सुशील कुमार शैली


  

हम जो अपने समय को 
एक हादसे की तरह जिय रहे हैं
विक्षिप्त
घटनाएँ चाय की बातों सी
दिनचर्या में शामिल हो रही हैं 
निस्तब्ध
सड़क पर कुचले हुए आदमी के नाम 
बोलती है
धर्म-निरपेक्षता
विकास की खुली फाईलों में 
कहीं नहीं है
रोज़गार
चौराहों पर इकट्ठा युवा टोलियों 
की पीठ पर लिखी हैं
लाठियाँ
आक्रोश में शब्द उगलती कलमें
लाल आँखों में
जड़ दी गईं हैं
बंदूक की गोलियाँ
लेकिन फिर भी
शहर की जुबान पर मशहूर है कि
हादसें यहाँ नहीं होते |
 

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