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वर्ष: 2, अंक 31, फरवरी(द्वितीय), 2018



खिलौना


संतोष कुमार वर्मा


 

मैं  एक  खिलौना हूँ 
लोग आते हैं, मुझे देखते हैं 
जिसे मैं  पसंद  आता हूँ 
वो अपना लेते हैं 
अपनाकर मुझसे  खेलते हैं 
और छोड़ देते है 
उस टूटे और पुराने,
खिलौने की  भांति 
और खोजने के लिए 
निकल जाते हैं 
मुझ जैसा कोई दूसरा 
नया  खिलौना ............... !!
 
 

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