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वर्ष: 2, अंक 31, फरवरी(द्वितीय), 2018



भूख की पीड़ा .....की
कितनी संतुष्टि .....


रवि रश्मि 'अनुभूति '


 
 
मैं कार ड्राइव कर 
कहीं जा रही थी कि 
सिग्नल पर , 
चौराहे के मोड़ से पहले 
रखे कचरे के ड्रम से , 
कुछ चुनते - बीनते , निकालते , 
और मुँह में डालते देखा 
तीन बच्चों को , मैले- कुचैले 
जीर्ण - शीर्ण कपड़ों में , 
लगा , वे बहुत भूखे हैं ।
भूख की पीड़ा 
सता रही थी उन्हें । 
मेरे दिल में एक कसक , 
एक तड़प , एक पीड़ा उभरी , 
मेरा दिल , मेरा उदर कुलबुलाया । 
आगे बढ़ने से पहले ही मैं 
सिग्नल से दाहिनी ओर मुड़ी , 
रुकी खाली जगह पर 
और खूब रोई ।
फिर आगे जाकर खाना खरीद कर 
वापस आयी उसी जगह पर ।
बच्चों को सड़क के पार बुलाया ,
पेट भर खाना उन्हें खिलाया ।
मैं आशीर्वाद दे आगे बढ़ी ।
काम समाप्त कर 
पुनः वापस आयी ।
बच्चे वहीं थे ।
मैंने उन्हें कपड़े और खाना दिया
खाने से मना कर दिया उन्होंने , 
पेट भरा था उनका 
भूख की पीड़ा शांत हो चुकी थी ;
मैंने महसूस की , 
उन नन्हों की आँखों में कृतज्ञता की चमक  ।  
मैंने देखा , 
कितनी संतुष्टि थी उनके चेहरों पर ,
उतनी ही संतुष्टि थी 
मेरी रूह और मेरे चेहरे पर ।
 

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