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वर्ष: 2, अंक 31, फरवरी(द्वितीय), 2018



जीवन एक दीप


डॉ.प्रमोद सोनवानी पुष्प


   

देखो भाई यह दीपक ,
ढेरों खुशियाँ देती है ।
पल भर में दीप यही ,
बारिस दुःख की करती है ।।1।।

देखो तो दीपों का खेल ,
जीवन भी मोड़ देती है ।
यह जीवन है दीप समान ,
जो जलती-बुझती रहती है ।।2।।

जीवन की कैसी परिभाषा ,
इसमें छुपी आशा -निराशा ।
आशा सबकी है पिपाशा ,
पुष्प समझे निराशा की भाषा ।।3।।
 

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