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वर्ष: 2, अंक 31, फरवरी(द्वितीय), 2018



बाल रवि


डॉ.प्रमोद सोनवानी पुष्प


   
 
नभ के उर पर बाल रवि ,
मंथर-मंथर उदित हुई ।
लगता सु-सरोज सम ,
रक्त कणिका खिली हुई ।।1।।

सतरंगी किरण फ़ैल रही थी,
धरा भी पुलकित-पुलकित सी थी ।
पुष्पों की भी मोहक खुशबू ,
चहुँ दिशाएँ फ़ैल रही थी ।।2।।

खग तरु पर थिरक-थिरक कर,
मोद अंक में खेल रहे थे ।
ठंडी-ठंडी पवन सुहानी ,
बड़ी अजब सी बह रहे थे ।।3।।
 

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