Sahityasudha view
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
मुखपृष्ठ


साहित्यकारों की रचना स्थली

वर्ष: 2, अंक 31, फरवरी(द्वितीय), 2018



औझल होती छाया


नरेश कुमार



मैंने देखी है 
धूप से बेहाल, औझल होती छाया।
फिर भी मैं परेशान सा हैरान भागता हूँ
जंगल की तरफ,
उस पेड़ की तलाश में
जिसकी हमेशा रही हो छाया ।
बहुत दरख्त मिले 
जिनकी अभी कुछ छाया बाकी थी
लेकिन इधर से उधर स्थान बदलती,
आगे निकल गई वो छाया
और उसके पीछे अब भी
बरकरार है तपती धूप।
अचानक,
पीछे मुड़कर जो देखा मैंने,नजर आया
छोटा होता अपना ही साया।
मैंने देखी है 
धूप से बेहाल , औझल होती छाया।
झुलस गए चेहरे,परेशान शक्ल,है डर
ना आ पाए छांव कभी इस पेड़ के नीचे।
कुछ ऊब चुके हैं धूप से, लेकिन
धूप में पले-पके
उठने उठाने का नाम नहीं लेते।
ऊब चुका मैं भी,
अब है छांव की खोज
हर रोज।
एक आशा है,
ये जंगलों की जगह बनी इमारतें
संचय कर सके भविष्य की छांव का।
परन्तु
शीतल व शुद्ध न होगी वह छाया,
न ही श्रमहारी होगी ;
छाया भी एक तपन का एहसास देगी,
जिसमें झुलसती नजर आ रही मुझे
मानव की काया।
मैंने देखी है 
धूप से बेहाल , औझल होती छाया।
 

कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें