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वर्ष: 2, अंक 31, फरवरी(द्वितीय), 2018



पूरब पश्चिम


मोती प्रसाद साहू



मैं पूरब से बोल रहा हूॅ
तू पश्चिम को देख रहा है।
मैं उगता सूरज देख रहा हूॅ
तू अस्ताचल झाॅक रहा है।
मैं नमस्कार नित बोल रहा हूॅ
तू तोपों को खोल रहा है।
मैं जग का मन सींच रहा हूॅ
तू मुट्ठी को भींच रहा है।
मैं मंगल का बीज बो रहा
तू विस्फोटक फोड़ रहा है।
मैं धरती को माॅ कहता हूॅ
तू इसको बस ग्रह कहता है।
मैं त्याग-भोग का पाठ पढ़ाता
उल्टे तू जमीन हथियाता।
मैं शाश्वत हित विज्ञानी
तू नश्वरता ढ़ूढ रहा है।
मैं पूरब से बोल रहा हूॅ
तू पश्चिम को देख रहा है।

 

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