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वर्ष: 2, अंक 31, फरवरी(द्वितीय), 2018



किसान


कुलदीप पाण्डेय आजाद


 
 
तापितु हृदय करने वाली जब ,
किरण भूमि पर पड़ती है |
होता दिनकर पूर्ण रूप में ,
हर जन-जाति तड़पती है |
गर्म हवा के झोंके से जब ,
धारा विकल हो जाती है |
व्याकुल मनुज सभी होते हैं ,
बढ़ाएँ यह लाती है |
तरुवर नीचे पथिक सभी जब ,
बैठे छाया में होते |
नत किसान के मस्तक को तब ,
जल के छोटे कण धोते |
तर-तर बूंदे गिरती हैं जो ,
लहराती फासले जिससे |
तप्त अग्नि सी वसुधा है जो ,
खेतों में चलते जिसपे |
माँ लेकर जाती है खाना ,
उसे बुलाती पाने को |
बहुत धूप कहती है उससे ,
जल्दी से घर आने को |
धुलकर हाथ काम में फिरसे ,
उसी भांति लग जाता है |
स्वंम धूप में जलता है तब ,
मनुज निवाला पाता है |
 

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