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वर्ष: 2, अंक 31, फरवरी(द्वितीय), 2018



फिर चीखे - अँधियारा क्यों ...?


कृष्ण भारतीय


 

बन्द  गली  में  सब  आ  बैठे -
फिर चीखे - अँधियारा क्यों ?

आसपास ऊँची दीवारें ऊपर -
छत भी तनी हुई,
घुप्प अँधेरा और घुटन से तंग -
भीड की ठनी हुई ;

कभी भीड से पूछा - इतने दशकों -
ये स्वीकारा क्यों ?

आज धूप की सेंध लगी तो घुटन -
परेशाँ चीख़ी है ;
मिली भीड को राहत , गंदा खेल -
सियासी सीखी है ;

बाल नोचते तम से पूछो - गंदा -
खेल उतारा क्यों ?

धूप गली में घुसी तो चेहरे दीखे -
चोर उचक्कों के ;
पीठ फेर कर मिले भेड़िये माँस -
चबाते बच्चों के ;

अब समझे - पहले राजा को हमने -
खींच उतारा क्यों ?

इस राजा को भी देखेंगे अभी -
चला ही थोड़ा है ;
घास खिलाकर हरी हमीं ने पाला -
देसी घोड़ा है ;

गलत चला तो टाँग तोड़कर फिर -
बोलेंगे - मारा क्यों ?
 

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