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वर्ष: 2, अंक 31, फरवरी(द्वितीय), 2018



इस बार


हरदीप सबरवाल


 	
   
इस बार जब उड़न-तश्तरीया आऐगीं, 
तो वो होंगी हैरान देखकर, 
यहां वहां लगी आग को, और कहेगीं 
लगानी ही है अगर आग 
और जलाना ही है जरूरी कुछ 
तो जला दो ये जात-पात, 
उठा कर फेंक दो कहीं दूर 
आरक्षण की इन बैसाखीयों को 
जला दो इनकी होली, 
मिटा दो ये मज़हब ये धर्म सारे 
बांट रहे है 
रोकते है ,इसांनो को इसांन रहने से , 
चुने जाते है जहां नेता धर्म और जाति के नाम पर, 
हटा दो ये व्यव्सथा , 
घटा दो ये मानसिकता , 
हजारो सालो से आऐ हो करते यूद्ध 
वर्ण और रंग देखकर 
जिता दो अबके बार , एक बार 
मानव मात्र को , 
इस बार जब उड़न-तश्तरीयां आऐगीं 
तो वो ही पूछेगीं 
क्योकिं इंसान तो इंसानो की वहशियत देख कर , 
ना हैरान होता है , 
ना पूछता है कुछ ? 
 
 

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