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वर्ष: 2, अंक 31, फरवरी(द्वितीय), 2018



आज की नारी हूँ


डॉ. अश्वनी कुमार वर्मा


  

मैँ आज की नारी हूँ
अब में न अबला 
न ही नादान रही हूँ
न किसी से दबी हुई 
न ही किसी की पहचान हूँ
मेरी अपनी पहचान है
मै स्वाभिमान से जीती हूँ
रखती अंदर ख़ुद्दारी हूँ
मै आज की नारी हूँ
पुरुष प्रधान जगत को मैंने
अपने लहू से  सींचा है
हर जगह साथ देकर 
अपना कर्तव्य निभाया है
जो काम मर्द करते आये
हर काम वो करके दिखलाया
इसलिए में खुद्दारी हूँ
मै आज स्वर्णिम अतीत सदृश
फिर से पुरुषों पर भारी हूँ
मैं आज की नारी हूँ
मैं सीमा से सीमाओ तक 
औऱ सभी मैदानों तक हूँ
मै माता,बहन और पुत्री 
लेखिक और कवयित्री हूँ
अपने दम से जीती जग में
नौकरी पेसा वाली हूँ
मैं आज की नारी हूँ
हर युग में मैं सब पर भारी हूँ
कदम मिला चलोगे
तो नाम दाम सब मिल जाएगा
मै उस भविष्य स्वर्णिम युग की
एक आशा की चिंगारी हूँ
मैं आज की नारी हूँ
मैं आज की नारी हूँ।
 

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