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वर्ष: 2, अंक 31, फरवरी(द्वितीय), 2018



पर्ण विलगन


डॉ. अश्वनी कुमार वर्मा


  

“मैं” पत्ती टूटी हुई !
जमीन पर गिरी हुई,
विरह का दुःख झेलती,
और मिट्टी में सामने का,
इंतज़ार बेसब्र करती हुई,
		“मैं” पत्ती टूटी हुई !

कभी पितृतुल्य वृक्ष,
कभी मातृतुल्य धरती,
की ओर देखती हुई,
कभी विलगन का दुःख,
कभी धरती से मिलन का सुख,
ह्रदय भर महसूस करती हुई,
		“मैं” पत्ती टूटी हुई !

वो मेरा शाखा से निकलना,
शिशु का जैसे पैदा होना,
हरे रंग में लिपटी हुई,
कुछ शूल सी, कुछ पंख सी,
मासूम सी, कुछ जिद्दी सी,
		“मैं” पत्ती टूटी हुई !

वो मेरा प्यारा सा बचपन,
मैं थी एक कोपल सी,
बारिश की बूंदों में,
कुछ खिलखिलाती सी,
और कुछ इठलाती सी,
खेलती और लहलहाती,
		“मैं” पत्ती टूटी हुई !

बया को आसरा देती हुई,
उस भँवरे से घंटो,
बातें करती हुई,
उसके गुनगुनाने का,
आनंद लेती हुई,
उन लम्हों को याद करती हुई,
आज फिर से रो पड़ी,
		“मैं” पत्ती टूटी हुई !

उम्र गुजरते हुए देखती हुई,
मैं रंग बदलती हुई,
हरे से नारंगी,
नारंगी से पीली,
और फिर पीली पड़ती हुई,
		“मैं” पत्ती टूटी हुई !

अतीत की ओर झांकती हुई,
पिछले बसन्त को सोचती हुई,
याद कर-कर टूटती हुई,
इस धरती पर पड़ी हुई,
और इसी में समा जाने का,
इंतज़ार बेसब्र करती हुई,
		“मैं” पत्ती टूटी हुई !

पर, मैं फिर जन्म लूंगी,
मैं फिर लहलहाउंगी,
मैं, ना हारने वाली,
मै, ना रुकने वाली,
		“मैं” पत्ती टूटी हुई !									 
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