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वर्ष: 2, अंक 31, फरवरी(द्वितीय), 2018



मुझे नही ढूंढनी


डॉ० अनिल चड्डा


 
मुझे नही ढूंढनी
अपनी वो खोई हुई डायरी
जिसमे तुम्हारी
यादों की दास्तान
छुपी हो
मुझे नहीं ढूंढनी
तुम्हारी वो लिखी हुई कविता
जिसमें तमने झूठ की
कहानी गढ़ी हो
मुझे नहीं ढूंढनी
तुम्हारी वो मोहिनो तसवीर
जिससे तुम्हारी बेवफाई 
झलकती हो
मुझे नहीं ढूंढनी
तुम्हारी हाथ की
लिखी वो चिट्ठी
जो तुम्हारे जज्बात कहती हो
खोये ही रहने दो
तुम्हारी यादों के
वो सब सम्बल
कि मुश्किल कर देते हैं
आज का जीना
न किसी पर भरोसा
न संग -संग चलना
ये सब ले जाते हैं
मेरा खुल के हँसना
छुपे ही रहने दो
बिसरे ही रहने दो
वो सब बातें
वो सब यादें
		 
 

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