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वर्ष: 2, अंक 31,  फरवरी(द्वितीय), 2018



संस्कार


हर्ष कुमार सेठ


रात के दो बज रह थे, मेरा पूरा ध्यान रमेश पर था। कल सुबह की गाड़ी से मुझे अपने घर जाना था। रमेश अभी भी साहस से मेरे सामने बैठा था दोनों हाथों से उसने अपना चेहरा छुपा रखा था, आज भी वह अपने आप को विचलित सा हुआ दिखाई नहीं देना चाहता था। मुझे आज भी याद है जब हम 10वीं कक्षा में एक साथ पढ़ते थे। तब एक दिन उसके पिता का देहान्त हो गया था। कभी-कभी कक्षा में वह उदास बैठा रहता था पर कभी रोता हुआ दिखाई नहीं दिया, शायद यह उसकी निडरता थी। कुछ ऐसी निडरता के कारण ही मैं हमेशा उसकी ओर खिंचा चला आया ओर धीर-धीरे हम गहरे दोस्त हो गए। पढ़ते–पढ़ते हम एक ही कॉलेज में आ गए। मैं पढ़ाई में थोड़ा कमज़ोर था इसलिए बी.ए. में दाख़िला मिला पर रमेश का दिमाग़ बहुत तेज़ था इसलिए उसका बी.कॉम (एच) में दाख़िला हुआ। रमेश खेल में भी बहुत चतुर था रोज़ सुबह-सुबह वह अपने क्रिकेट की प्रेक्टिस के लिए कॉलेज जाता था। मुझे अच्छी तरह याद है जब कॉलेज में क्रिकेट की टीम बननी थी तो मैं सुबह रमेश से पहले कॉलेज पहुँच गया था, क्योंकि आज रमेश भी कॉलेज टीम में चुना जाता था। वह एक अच्छा खिलाड़ी था; यह मेरा विश्‍वास था। सुबह 6 बजे से 10 बजे तक सब लड़के आ गए थे पर रमेश अभी तक नहीं आया था। थोड़ी देर में क्रिकेट का कोच भी आ गया था। उन्होंने ही टीम बनाई और मैच शुरू कर दिया। एक–दो लड़के बाद में आए जिन्हें अलग-अलग टीमों में रखा गया। जब 1 बज गया तो मुझसे रहा ना गया। मैं आख़िर रमेश के घर की ओर चल दिया। उसके घर पहुँच कर पता चला कि रमेश की माँ बहुत बीमार थी और वह आज सुबह दो बजे चल बसी। यह घटना कोई साधारण घटना नहीं थी।

एक तरफ़ रमेश की माँ चल बसी दूसरी तरफ़ वह कॉलेज की क्रिकेट टीम में शामिल नहीं हो सका; जिससे उसका आगे का सारा कैरियर चौपट हो सकता था। अगर वह कॉलेज टीम में शामिल हो जाता तो कम से कम कुछ समय बाद एक अच्छी नौकरी प्राप्त कर ही लेता, पर इस समय ऐसी बातें सोचने से कोई लाभ नहीं था। एक बार फिर मैंने रमेश को गम्भीर अवस्था में देखा, वह शायद बहुत दुःख के कारण वह रो भी नहीं पा रहा था, पर मेरा साथ पाकर उसे कुछ सहारा मिला। अब उसका दुनियाँ में अपने ख़ून के रिश्‍ते में कोई नहीं था। आगे पढ़ना उसके लिए बहुत मुश्किल था पर मेरे पिता जी की जान-पहचान के कारण उसे रात को भी ट्यूशन मिल गये थे।

रोज़ रात को 2 घंटे वह पढ़ाने हमारे ही घर के पास आता था और मुझसे भी मिलता था। जब तक माँ थी उनकी पेन्शन से ही घर का खर्चा चलता था। घर भी किराए का था। जो थोड़ा बहुत सोना माँ का बचाया हुआ था, वह धीरे-धीरे बेचकर मकान का किराया चुकाता जा रहा था। पढ़ाई करनी ज़रूरी थी। शायद कॉलेज के बाद अच्छी नौकरी मिल जाए- यही एक उम्मीद थी। तीन साल बीतते समय ना लगा; वह द्वितीय श्रेणी में और मैं तृतीय श्रेणी में पास हुआ। अब आगे क्या करना है, भविष्य के लिए मेरे पास तो विकल्प था, क्योंकि मेरे पिता जी की एक बटन की फैक्ट्री थी पर रमेश का क्या होगा? एक–एक करके सात महीने बीत गए पर रमेश को कोई नौकरी नहीं मिली।

अब हमारा मिलना भी कम होता जा रहा था क्योंकि मैं भी पिताजी के काम में हाथ बँटाने लगा था, पर रमेश की चिंता दिल में हमेशा रहती थी। सुबह के 10 बजे थे। किसी ने घर की घंटी बजायी, माँ ने दरवाज़ा खोला तो रमेश खड़ा था। मैंने कहा, "अन्दर आ जाओ।" वह माँ के पैर छूकर मेरे कमरें में आ गया। थोड़ी देर बाद चाय पीकर बोला, "यार कल शाम को मैं यह शहर छोड़कर जा रहा हूँ, मुझे नौकरी मिल गई है।"

उसने यह बात इतने सहज ढंग से कही तो मैं हतप्रभ हो गया। वो इस शहर को छोड़कर चला जाएगा। लेकिन उसके भविष्य का सवाल था - मैं बहुत ख़ुश था। मैने पूछा, "कहाँ पर तुम्हें यह नौकरी मिली।"

उसने कहा, "जयपुर में एक कम्पनी में कलर्क की है। वह बहुत अच्छी नहीं हैं लेकिन गुज़ारा चलाने के लिए करनी पड़ेगी।"

कलर्क की नौकरी एक छोटी कम्पनी में, मेरी समझ में नहीं आ रहा था क्या पैसा मिलेगा। इससे आगे मुझसे रहा ना गया मैंने आख़िर कह ही दिया कि यार इससे अच्छा तो तू हमारी फ़ैक्‍ट्री में कलर्क का काम कर ले, यहाँ रहेगा तो दो पैसे बचा पाएगा, पर रमेश ने कहा, "नहीं यार आज हम एक–दूसरे के बराबर हैं कल मैं तेरा नौकर हो जाऊँगा तो तुझे कैसा लगेगा? क्या तेरा दिल मानेगा?"

मेरा दिल तो वैसे भी नहीं मान रहा था लेकिन रमेश के भविष्य के लिए मैं उसकी बात मान गया ओर दिल्ली से जयपुर कोई दूर नहीं था। जब मिलना हो मिल सकते हैं।

अब वह जयपुर आ गया था और आज ठीक 7 साल बाद मैं उसके पास आया था पहले महीने में मिलना होता था फिर चिट्ठी लिखी जाती और अब 7 साल बाद मैं उसके घर उससे मिलने आया था। आज 7 साल बाद भी हालात वही के वही। आज भी उसकी ज़िन्दगी में चैन नहीं था। आज भी दुःख से वह सघर्ष कर रहा था। आख़िर ऐसा क्यों था कि उसकी ज़िन्दगी में उसको कोई सुख-चैन क्‍यो नहीं मिला जबकि वह हर तरफ़ से मुझसे अवल नम्बर पर था। एक तरफ़ मैं था पिता के देंहात के बाद ज़िन्दगी की हर ख़ुशी थी, बहुत से रुपये पिता जी छोड़ गए थे। अच्छी जान-पहचान के कारण बैंक का पेपर पास करके मैनेजर की नौकरी मिल गई, बटन की फैक्ट्री भी किराये पर दे दी थी, अब ज़िन्दगी में अराम ही अराम था। एक लड़का भी था ज़िन्दगी के हर सुख को हर पल को मैंने भोगा था। शायद सुख ही मेरा जीवन था। और एक तरफ़ रमेश था कि 7 साल से नौकरी कर रहा था, पर एक रुपया बचा नहीं सकता था। पैसा कम होने के कारण बच्चा पैदा करने में देर कर दी और आज उसका बच्चा होता नहीं था। क्योंकि देरी के कारण और कुछ उसकी पत्नी की बीमारी के कारण कुछ उसके अन्दर दोष आ गया था। अब सारी ज़िन्दगी ऐसे ही जीनी थी। ज़िन्दगी में सिर्फ़ संघर्ष ही संघर्ष था।

जिस ओहदे पर काम शुरू किया था उसी ओहदे पर आज भी कार्यरत था। नौकरी करने की इच्‍छा नहीं होती थी उसकी पर वह करता जा रहा था। पल-पल अपनी ज़िन्दगी को ख़त्म करता जा रहा था। दिल में सभी अरमानों की चिता जल रही थी। उषा पहले उसी के ऑफिस में काम करती थी पर अब उसने उसका काम छुड़ा दिया था, इसलिए नहीं कि पैसा वह बहुत कमा लेता था; बल्कि इसलिए क्योंकि वह अक्‍सर बीमार रहती थी। जितना रुपया उसे नौकरी करके मिलता वह किराए और रोज़ काम की चीज़ों में ख़त्म हो जाता । भविष्‍य के लिए कुछ भी नहीं बच पा रहा था। पर उससे भी ज़्याद दुखी था बच्चा ना होने के कारण! अगर कोई बच्चा हो जाता तो शायद उसकी मुस्कान देखकर अपने ग़मों को भुलाया जा सकता था, पर ऐसा ना हुआ। मैं सुबह उन दोनों से विदा लेके ट्रेन पकड़ने के लिए रवाना हो गया और भविष्य में उनके लिए अच्छी कामना मन में लिए ट्रेन में बैठ गया। समय बीतता गया। मैं अपने कार्य में बहुत घिरता गया। रात को घर पर एक-दो पैग ले लेता। धीरे-धीरे यह आदत बनती गई और मैंने काम पर जाना छोड़ दिया। अय्याशी की आदत शुरू से बढ़-चढ़कर थी धीरे-धीरे दिन में भी पीना शुरू कर दिया था। देर रात ताश खेलकर क्लब से लौटता।

आज ठीक 30 साल बाद मैं फिर अपने दोस्त के शहर जा रहा था। मैंने ज़िन्दगी में बहुत सुख पाया था पर आज मैं सुखी नहीं था। इस दौरान मुझे एक बार दिल का दौरा पड़ चुका था और जिस डॉक्टर ने दिल्ली में मेरा ऑपरेशन किया था वह अब जयपुर में था। इसलिए उसे दिखाने के लिए मैं जयपुर जा रहा था। अब मैं पैसे वाला भी नहीं था। बहुत कुछ तो मैं नशे को दे चुका था और जो बचा था, वह जब लड़के की शादी करी तो उसकी पत्नी ने उसे अपने क़ाबू में ले लिया और फैक्ट्री तो मैं अपने लड़के के नाम पहले से ही कर चुका था। अब मैं अपने को अक्सर अकेला महसूस करता था और इनके भरोसे रहना नहीं चाहता था। औलाद से मुझे सुख सिर्फ़ बचपन में ही मिला था। उसके बड़े होने के बाद मुझे उससे कोई सुख प्राप्त नहीं हुआ। मेरी पत्नी का देहान्त होने के बाद मेरे पास दु:ख के आलावा कुछ बाक़ी नहीं बचा था।

जयपुर पहुँकर सोचा दोस्‍त से मिलकर मन हल्का कर लूँ, पर यह सोचकर कि वह ख़ुद ग़रीबी में अपना समय काट रहा होगा, उसे क्या कष्ट देना; और मैं सीधा अस्पताल पहुँच गया। किसी तरह मैं डॉक्टर से मिलने का समय लेने में कामयाब हुआ पर तब तक डॉक्टर अपने घर जाने के लिए अस्पताल से निकल चुका था। मैं किसी तरह उसके पास पहुँचा तो उन्होंने मुझे तुरन्त पहचान लिया और मुझे अपने साथ गाड़ी में बिठा लिया। रास्ते में बोले कि घर चल कर आपका पूरा चेकअप कर लेता हूँ। थोड़ी देर बाद वह उस जगह पहुँचे जहाँ उनका घर था, लेकिन यहाँ तो पहले भी मैं आ चुका था। अरे ये तो मेरे यार का घर है! मैं अपने आपको रोक ना सका। उस घर के ऊपर सौरभ ....... लिखा था।

"डॉ. सौरभ क्या यहाँ कोई रमेश रहता है।"

इतना कहना था कि वह बोले वह तो मेरे पिताजी हैं, आप कैसे जानते हैं? "अरे वह तो मेरे बचपन का दोस्त है। मैं उसका यार अमर हूँ"

यह सुनकर वह बहुत ख़ुश हुआ और बोला, "मैं तो आपको अच्छी तरह जानता हूँ, क्योंकि पापा हर पल आपकी बातें करते हैं।"

बात करते–करते हम घर में दाख़िल हो गए। रमेश ने दरवाज़ा खोला तो मुझे देखकर बहुत ख़ुश हुआ और मैं उसे देखकर।

चाय के साथ बिस्कुट उठाते हुए मैंने पूछा, "यार ये तेरा लड़का है, तूने चिट्टी भी नहीं लिखी की तेरा लड़का हो गया है। इतनी बड़ी ख़ुशी तुने मुझसे छुपाई रखी।"

ड़ॉ. सौरभ तब तक अपने कमरे में चले गये थे।

रमेश ने बताना शुरू किया, "बस यार जीने की इच्‍छा उषा ओर मेरी दोनों की ख़त्म हो गई थी। मैंने अपनी कम्पनी से कुछ दिनों की छुट्टी माँगी तो उन्होंने मुझे हमेशा के लिए छुट्टी दे दी।

मैं बिल्कुल बेबस हो गया और दुःख ने मुझे पूरी तरह घेर लिया। मकान मालिक को बिना बताए हम उषा की बहन के घर जम्मू चले गए। कुछ समय बाद बहुत कोशिश करके मुझे फिर से वहीं एक होटल में नौकरी मिल गई। एकाउंटस मुझे बहेतर आता ही था। उषा की बहन ने मुझे सलाह दी की मैं कोई बच्चा गोद ले लूँ तो मैंने यह दो महीने का सौरभ गोद ले लिया। पर यह बात सौरभ को भी नहीं मालूम थी। उषा की बहन चल बसी बस यह राज़ अब हम दोनों या तू जानता है।

समय बीतता गया और मेरी बदली हो गई मुझे फिर वापिस जयपुर में ट्रान्सफर कर दिया गया। जयपुर में सबसे पहले हम मकान मालिक से मिले। तब मकान मालिक की हालत बहुत ही ख़राब थी। उसके बच्चों ने पैसों के लिए यह मकान हमें बेच दिया। उसकी दो लड़कियाँ थीं, जिनकी शादी मैंने ख़ुद करवाई।

शादी के बाद उनकी माँ अपने गाँव के मकान में चली गई। कभी-कभी आती है तो यहीं रहती है और लड़कियाँ भी ख़ुश हैं। सौरभ धीरे-धीरे बड़ा हुआ तो मैंने उसे पढ़ा लिखाकर पूरी कोशिश करके डॉक्टर बना दिया। मेरी ज़िन्दगी का यह सपना आख़िर पूरा हो गया।"

सौरभ इतने में ऊपर वाले कमरे से नीचे आ गया था। उसके हाथ में उसका बैग था। मैंने पूछा सौरभ ये बैग लेकर कहाँ जा रहे थे। सौरभ मुस्कुराया, "कहीं नहीं अकंल आप का चैकअप करना है। अब आप लेट जाइये और डॉक्टर की सभी बातें मानिए।" थोड़ी देर बाद वह बोला, "अंकल आप एकदम ठीक हैं पर प्रतिदिन सुबह टहलें और यहाँ आराम किजिए।"

रमेश ने भी तुरन्त कहा, "हाँ अब तुम यहीं रहोगे।"

"लेकिन दोस्त मैं यहाँ कैसे रह सकता हूँ। मैं तो बस अपना चैकअप करवाने आया था।"

तभी सौरभ बोला, "अंकल चैकअप भी होगा और हम साथ भी रहेगें।"

रमेश ने आग्रह किया, "यार कम से कम सौरभ की शादी तक ठहर जाओ। क्योंकि अगले महीने 9 तारिख़ को इसकी शादी हो रही है।"

"क्या!" ये सुनकर मैं बहुत ख़ुश हुआ क्योंकि उसकी शादी भी किसी डॉक्टर लड़की से हो रही थी जो उसके साथ ही काम करती थी।

रात को सोते समय मैं यह सोच रहा था कि रमेश अवल नंबर था ज़िन्दगी में उसने कितने दुःख उठाए पर आख़िर सुख उसे प्राप्त हो ही गया। यह सब उसके सब्र का फल है या उसकी ज़िन्दगी की ईमानदारी से जीने का ईनाम। एक तरफ़ मैं जिसके पास सब कुछ था और एक-एक कर मैंने सब कुछ गँवा दिया। और एक तरफ़ रमेश है जिसके पास कुछ भी नहीं था, यहाँ तक कि उसकी अपनी औलाद भी नहीं, फिर भी वह आज भी अवल नंबर है। यह एक आदर्श व्यक्ति के जीने का रहस्य है। सत्‍य को आप कितना भी छुपाना चाहो आप छुपा नहीं सकते। सही व्यक्ति से असफलता हार जाती है; शरीफ़ व सच्चे व्यक्ति आख़िर जीत ही जाते हैं - जो रमेश के साथ हुआ।

आज वह दिन भी आ गया जब सौरभ दुल्हा बना अपनी दुल्हन के साथ बैठा था। हँसी मज़ाक के साथ-साथ 4 दिन बीत गए। सुबह–सुबह पाँच बजे मैं टहलने के लिए निकलने लगा तो देखा कि सौरभ के कमरें से कुछ तेज़ आवाज़ें आ रहीं थीं। मुझसे रहा ना गया और मैं दरवाज़े के पास कान लगा कर खड़ा हो गया। रमेश कह रहा था, "तुम्हें अभी चार दिन हुए हैं यहाँ आए, तुम्हारे लिए अपने माँ-बाप को, जो मेरी 25 साल से देख-भाल कर रहे हैं, उन्हें भूलने वाला नहीं। चाहे तुम मेरे साथ हो या नहीं और एक बात मैं तुम्हें और बता दूँ कि तुमने मुझसे उनकी औलाद मानकर शादी की है, लेकिन सच यह है कि मैं दो महीने का था तब उन्होंने मुझे गोद लिया था। यह राज़ मैं अपनी मौसी की चिट्ठी से समझा था, जो उन्होंने मरने से पहले माँ को लिखी थी। वह ख़त मेरे हाथ पड़ गया। वह .... जिसका बच्चा मैं नहीं हूँ और फिर भी ज़िन्दगी का सब कुछ मेरे लिए लगा दिया। मैंने वह रिर्पोट भी देखी है जो मेरे माँ-बाप के टैस्ट की है। उसमें साफ़ है कि वह चाहते तो अपना बच्चा कर सकते थे पर सिर्फ़ मेरे कारण उन्होंने यह भी बलिदान दे दिया। क्योंकि अपनी औलाद होती तो कहीं हमारे रिश्ते में दरार न पड़ जाए; कहीं कोई कमी मुझे पालने में न हो जाए। ऐसे माँ-बाप को तुम्हें भी मेरे भगवान की तरह पूजना पड़ेगा। मैं तुम्हारा पति हूँ अगर मेरे साथ रहना है तो मेरे माँ-बाप आज से, अभी से तुम्हारे भगवान होंगे।

सौरभ कहे जा रहा था, यदि वह कहीं भी, कितने भी ग़लत क्यों न हो जाएँ। मैं अपने आपको अपनी ज़िन्दगी को छोड़ सकता हूँ पर किसी भी कारणवश अपने माँ-बाप को छोड़कर नहीं जाऊँगा। अगर यह सब मैं करना चाहता तो आज से डेढ़ साल पहले जब मैं दिल्ली में था तो मुझे बड़े - बड़े ऑफर मिले लेकिन मैंने सब कुछ ठुकरा कर यहाँ जयपुर अपनी प्रैक्टीस करके सरकारी अस्पताल में आ गया। जहाँ मेरी मुलाकात तुमसे हुई। मधु यह सब सुनकर आवाक सी खडी थी शायद वह सौरभ के साथ शादी करके ज़िन्दगी में बहुत ऊपर उठने की सोच रही थी और अचानक सौरभ ने उसके सपने तोड़ दिए। शायद वह चाहती थी वह दिल्ली जाकर अपना क्लिनिक खोले और खूब पैसा कमाये पर सौरभ यह नहीं चाहता था।

अपने बेटे को ऐसे संस्कार मैं आज तक नहीं दे सका और एक रमेश था जो कि ज़िन्दगी मैं शायद सबसे ज्यादा ऊंचा उठ गया था, पैसो कि ज़िन्दगी में एहमियत है पर इंसानी रिश्‍तों के आगे उसका कोई अर्थ नहीं है, मैं जीवन भर यह सोचता रहा कि मैं एक अमीर आदमी हूँ खुश हूँ कुछ ही समय में मेरे संस्कारों ने मेरे बेटे को मुझसे छिनकर उन्‍हीं गंदी बुराई में धकेल दिया। जबकि एक ओर रमेश के संस्कारो ने अपना बेटा ना होते हुए ज़िन्दगी को उस उँचाई पर ला दिया था, जहाँ वह दुनियाँ का सबसे बड़ा आदमी था। यह रमेश के संस्कार थे जो पैसे से नहीं खरीदे जा सकते थे। चाहे जितना भी दुःख क्यों ना आ जाए, जो व्यक्ति अपने संस्कारों से अपने जीवन की संचाई से नहीं भागता है। एक ना एक दिन उसे इसका फल जरूर प्राप्त होता है। मेरी आँखें नम थी मैं सैर करने के लिए चला गया। अब मैं वापिस नहीं जाना चाहता था। रमेश की अच्छी और साफ ज़िन्दगी को देखकर मैं बहुत खुश था और ना जाने क्या सोचते - सोचते मैं एक ऐसी रेल गाड़ी में बैठ गया जो ना जाने कहां जा रही थी।


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