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वर्ष: 2, अंक 31, फरवरी(द्वितीय), 2018



सुन्दर सपना टूटा


प्राण शर्मा


  
      
निर्धनता में बच्चा टूटा 
पतझड़ में ज्यों पत्ता टूटा 
 
ऐसा लगा दिल अपना टूटा 
जब भी कोई शीशा टूटा 
 
चलने में मुश्किल होनी थी 
जूते का था तलवा टूटा 
 
माना पीतल का था लेकिन 
छत से गिरा तो कलसा टूटा 
 
दुःख का बोझ बड़ा भारी था 
अच्छा - ख़ासा बंदा टूटा 
 
काश किसीका टूटे न वैसे 
ज्यों यारों का रिश्ता टूटा 
 
अच्छा `प्राण`लगा कब मन को 
जब भी सुन्दर सपना टूटा 

 

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