Sahityasudha view
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
मुखपृष्ठ


साहित्यकारों की रचना स्थली

वर्ष: 2, अंक 31, फरवरी(द्वितीय), 2018



सच को रंग बदलते देखा


नज़्म सुभाष



बाज़ी  हाथ   निकलते   देखा
सच  को  रंग   बदलते   देखा

नाम अमन था लेकिन  हर सू
उसको  आग   उगलते  देखा 

क्या  दूं  अपनों की परिभाषा
जब  अपनों  को छलते देखा 

चेह्रे  पर   मासूम   हंसी    थी
दिल  में   दर्द   मचलते  देखा 

पौध  मुहब्बत   की  रोपी  थी
फूल   नफरती  फलते   देखा

जिसकी फितरत में है जलना 
उस  सूरज  को  ढलते   देखा

आखिर आंच सहेजा कबतक
गुस्सा  'नज़्म'   उबलते  देखा 
 

कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें