Sahityasudha view
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
मुखपृष्ठ


साहित्यकारों की रचना स्थली

वर्ष: 2, अंक 31, फरवरी(द्वितीय), 2018



जो जहाँ भी जहाँ से उठता है


गंगा धर शर्मा 'हिन्दुस्तान'


 

जो जहाँ भी जहाँ से उठता है,
तो ज़नाजा वहाँ से उठता है।

बात पूरी नहीं करी तो फिर,
अक्द तेरी जबां से उठता है।

आब ही तो है जान मोती की,
भाव उसका वहाँ से उठता है।

कश्तियाँ डूब डूब जाती हैं,
यह बवंडर कहाँ से उठता है।
बस्तियां खाक ही न हो जाये,
ये धुँआ सा कहाँ से उठता है।

आग से खेलता भला क्यां है,
ये पतंगा कहाँ से उठता है।
इल्म तो 'हिन्दुस्तान' से आया,
शोर सारे जहाँ से उठता है।
 

कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें