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वर्ष: 2, अंक 31, फरवरी(द्वितीय), 2018



तू परिन्दा तो आसमां हम थे


असमा सुबहानी


 
तू परिन्दा तो आसमां हम थे,
इक मुहब्बत की दास्तां हम थे,
किस तरह ग़म से सामना होता, 
आप औ ग़म के दरमियां हम थे,
हम जो ख़ामोश हो गए थे तो ,
आप समझे कि बेज़ुबां हम थे,
खूबसूरत हमारा रिश्ता था
तू फ़लक था तो कहकशां हम थे,
बीच रस्ते में तुमने छोड़ा जब,
लौट आए वहीं ,जहाँ हम थे,
ख़ास रिश्ता था आपका-मेरा, 
लफ़्ज़े-चाहत का तर्जुमां हम थे,
जिनके दम से थीं रौनकें-गुलशन, 
बाग़बाँ सुन वो तितलियाँ हम थे||
		 
 

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