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वर्ष: 2, अंक 31, फरवरी(द्वितीय), 2018



जिसको देखो वही मुझसे रूठा लगे


अनिरुद्ध सिन्हा


 
जिसको देखो वही मुझसे रूठा लगे 
इस ज़माने में कोई तो अपना लगे 

बीच  में  थोड़ी-थोड़ी  दरारें  भी हैं
अब ये पुल भी मुझे टूटता सा लगे 

दिल की बातें कहूँ या तुम्हारी  कहूँ 
ऐसा क्या मैं कहूँ तुमको अच्छा लगे 

जब तलक राज़ थी तो बहुत खूब थी 
अब तो दुनिया भी कोई तमाशा लगे 

ज़िन्दगी कोई किस्सा नहीं है मगर 
ये हक़ीक़त भी उसको फ़साना लगे 
 

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