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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 78, फरवरी(प्रथम), 2020

योगेन्द्र निषाद की पुस्तक
"दो लफ्जों में"की समीक्षा

समीक्षक : विजय पंडा

गजल व कविता संग्रह योगेन्द्र निषाद की "दो लफ्जों में - - -" पुस्तक की शुरुआत कवि जिव्हाग्रवासिनी माँ सरस्वती की स्तुति से है।नववर्ष की बेला स्वागत गीत के साथ मानव की आपसी प्रतिस्पर्धा को अपनी भावनाओं में व्यक्त करते हुए "हर जगह कत्ल का काम बढ़ता रहा" जैसी पँक्तियाँ गुनगुनाने लायक है।कहीं सरल शब्दों का प्रयोग हुआ है तो कहीं विदेशज शब्दों को समाहित कर कठिन तो बनाया लेकिन साहित्यिक अभिरुचि वालों को पढ़कर आनन्द भी आएगा एवं पाठकों के मध्य अर्थ जानने की उत्सुकता बनी रहेगी।अपनी राष्ट्रीयता की भावना को जाहिर करते हुए "मेरा प्यारा तिरंगा" को लिखा तो समाज का एक मुख्य किन्तु सदियों से शोषक वर्ग मजदूर के सम्बंध में "मैं हूँ एक मजदूर" में मजदूर की महत्ता बताते हुए उसकी भावनाओं को अपने शब्दों में निरूपित किया है।प्रकृति की बात करें तो ओस की नन्हीं बूंदों को एवं गर्मी ऋतु का हूबहू वर्णन करने का प्रयास किया गया है।गजल व कविता के माध्यम से मध्यम वर्गीय आदमी के ह्रदय में आन्दोलित धड़कन को प्रस्तुत करते हुए व्यक्त किया है, रचनाएँ समाज के विचारों व भावों को दर्शाता है। राष्ट्र व समाज ,प्रकृति से कोई लेखनीकार अछूता नही है।शुरूवात पृष्ठ में सम्पादकीय की कमी महसूस हो रही है।पुस्तक में बासठ गजल व इक्कीस कविताओं को भावनाओं शब्दों के माध्यम से पिरोया गया है।नारी शक्ति को भी ईश्वरी संरचना मान उसकी सत्ता को स्वीकार करते हुए पँक्तियाँ सृजित किया गया है। मानव की भागम भाग जीवन को कविता में रेखांकित किया गया।सृजनात्मक, भाव ,विचारों का संगम कहा जा सकता है दो लफ्जों में - - - - बस पढ़ते जाइये प्रिंट की त्रुटियों को नजरअंदाज करते हुए।

पुस्तक :- दो लफ्जों में(योगेन्द्र निषाद)
कीमत:- 130 /-रुपये (फिल्पकार्ट एवं आमाजन में उपलब्ध।
प्रकाशक:- BRivers
ISBN:- 978- 93 -88727 -74- 7


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