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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 78, फरवरी(प्रथम), 2020

क्यों हमें अपना बनाया आपने

शिवेन्द्र मिश्र 'शिव'

ऐ सितमगर! क्यों हमें अपना बनाया आपने, चैन मेरा इस कदर दिल का चुराया आपने। रात भर यादें तुम्हारी अब जगाती हैं मुझे, रोग चाहत का अज़ब कैसा लगाया आपने। टूटती अब जा रही हैं ख्वाहिशें दिल की मेरी, बेवज़ह दिल को हमारे क्यों चुराया आपने। पास मेरे आपको आना न था तो क्यों सनम, सिलसिला ये प्यार का फिर क्यों बढा़या आपने। खेलना ही था हमारे जब तुम्हें जज्बात से, क्यों वफा के ख्वाब आँखों में सजाया आपने। यूँ तड़पता छोड़कर जाना ही था शिव को अगर, छीनकर खुशियाँ हमारी क्यों रुलाया आपने। खुश रहो तुम यह दुआ बस दिल हमारा कर रहा, हमसफ़र खुद दर्द का हमको बनाया आपने।

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